संदेह साक्ष्य का विकल्प नहीं : हाई कोर्ट जबलपुर, (ईएमएस)। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने पत्नी की जलकर हुई मौत के करीब 18 साल पुराने मामले में हत्या के दोषी ठहराए गए पति को बरी कर दिया है। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह की डिवीजन बेंच ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ हत्या, पत्नी के साथ क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने जैसे आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संदेह कितना भी प्रबल क्यों न हो, वह ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य का स्थान नहीं ले सकता। मामला हरदा जिले के टिमरनी थाना क्षेत्र का है। अभियोजन के अनुसार सुनीता कनेरे की शादी वर्ष 1999 में अशोक कनेरे से हुई थी। उनके दो बच्चे थे। 20 अगस्त 2008 को सुनीता गंभीर रूप से जली हुई अवस्था में मिली थीं। उन्हें पहले जिला अस्पताल हरदा और बाद में चोइथराम अस्पताल, इंदौर रेफर किया गया, जहां उपचार के दौरान 21 अगस्त को उनकी मौत हो गई। ट्रायल कोर्ट ने अशोक कनेरे को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 498-ए के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इस फैसले को चुनौती देते हुए अशोक ने हाईकोर्ट में अपील की थी। उनकी ओर से अधिवक्ता ईशान दत्त ने पैरवी की। अस्पताल में दर्ज बयान ने बदला मामले का रुख........... हाईकोर्ट ने मेडिकल रिकॉर्ड को अहम माना। जिला अस्पताल की मेडिकल लीगल रिपोर्ट में सुनीता के शरीर से केरोसिन की गंध आने का उल्लेख था और वह करीब 100 प्रतिशत जली हुई थीं। हालांकि अस्पताल में दर्ज हिस्ट्री में घटना को खाना बनाते समय स्टोव की लौ भड़कने से हुई दुर्घटना बताया गया था। चोइथराम अस्पताल की चिकित्सक डॉ. शोभा चिमनिया ने भी अदालत में बताया कि सुनीता घटना के बाद होश में थीं और उन्होंने स्वयं बताया था कि खाना बनाते समय स्टोव की लौ अचानक भड़कने से वह आग की चपेट में आ गईं। उन्होंने किसी अन्य व्यक्ति पर आरोप नहीं लगाया था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी हत्या साबित नहीं कर सकी.......... पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर डॉ. भारत बाजपेयी के बयान को भी हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण माना। डॉक्टर के अनुसार सुनीता की मौत हत्या, दुर्घटना अथवा आत्महत्या—किसी भी कारण से हो सकती थी। ऐसे में मेडिकल साक्ष्य से यह निश्चित रूप से स्थापित नहीं हो सका कि मौत हत्या के कारण हुई थी। जांच में लंबी देरी पर कोर्ट ने उठाए सवाल........... डिवीजन बेंच ने पुलिस जांच में हुई देरी को भी गंभीरता से लिया। कोर्ट ने पाया कि घटना के बाद घटनास्थल का निरीक्षण, नक्शा तैयार करने और स्टोव सहित अन्य महत्वपूर्ण वस्तुओं की जब्ती जैसी कार्रवाई काफी समय बाद की गई। जांच में करीब 27 महीने की देरी को भी अदालत ने संदेह की दृष्टि से देखा। रिकॉर्ड में कई दस्तावेजों पर तारीखों में ओवरराइटिंग का उल्लेख भी सामने आया। पुलिस अधिकारी के बयान के मुताबिक प्रारंभिक मर्ग जांच में किसी अपराध का खुलासा नहीं हुआ था। बाद में मृतका के पिता और बहन द्वारा वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से शिकायत किए जाने के बाद मामले की जांच आगे बढ़ी। हाईकोर्ट ने इन परिस्थितियों, मेडिकल साक्ष्यों और जांच में सामने आई कमियों को देखते हुए माना कि अभियोजन की कहानी संदेह से परे प्रमाणित नहीं हुई। इसके बाद अदालत ने हत्या और क्रूरता के आरोप में दोषी ठहराए गए अशोक कनेरे को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। सुनील साहू / मोनिका / 19 अगस्त 2026/ 02.03