- साधना में बाहरी आचरण के साथ अंतरंग भावों और उपयोग की शुद्धता जरूरी : आचार्य समय सागर महाराज भोपाल (ईएमएस)। जैन आचार्य समय सागर महाराज ने कहा कि आध्यात्मिक साधना में केवल बाहरी क्रियाओं को देखना पर्याप्त नहीं है। साधना की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उस क्रिया के पीछे साधक के मन में किस प्रकार के भाव और मानसिक उपयोग चल रहे हैं। उन्होंने कहा कि क्रिया अलग है और संज्ञा अलग, इसलिए साधक को अपने अंतरंग भावों पर निरंतर दृष्टि रखनी चाहिए। आध्यात्मिक स्वाध्याय के दौरान आचर्य श्री ने बताया कि आहार ग्रहण करना एक सामान्य क्रिया है, लेकिन उसके प्रति मन में उत्पन्न होने वाली रुचि, इच्छा या आसक्ति अलग विषय है। श्रमण आहार ग्रहण करते हुए भी स्वाध्याय में संलग्न रह सकते हैं। किंतु यदि आहार के प्रति विशेष रुचि अथवा उसे प्राप्त करने की इच्छा का भाव उत्पन्न होता है, तो साधना की दृष्टि से वहां परिग्रह संज्ञा का संबंध बन सकता है। स्वाध्याय में दर्शन और ज्ञान के अंतर को स्पष्ट करते हुए बताया गया कि विषय और विषयी के संबंध को दर्शन कहा जाता है, जबकि वस्तु को उसके वास्तविक स्वरूप में जानना ज्ञान है। साधना का उद्देश्य ज्ञान को राग-द्वेष से मुक्त कर निर्मल बनाना है। उन्होंने कहा कि सच्चा साधक विपरीत परिस्थितियों में भी समता बनाए रखता है। वन्य पशुओं के बीच धर्मध्यान में स्थित साधक उनके प्रति प्रतिकार या द्वेष का भाव नहीं रखता। यही आंतरिक समता उसे भय और प्रतिक्रिया से ऊपर उठाती है। आचार्य ने कहा कि बाहरी परिस्थितियों से अधिक महत्वपूर्ण मन की अवस्था और उपयोग की निर्मलता है। जब साधक अपने भावों को पहचानकर उन्हें संयमित करना सीखता है और राग-द्वेष का त्याग करता है, तभी उसकी साधना वास्तविक आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ती है।