आनंद पुरोहित भोपाल, (ईएमएस) मध्यप्रदेश की सत्ता राजनीति में विगत आठ सालों से चल रहे बगावती पुराण की अंततः समाप्ति हो ही गई। मध्यप्रदेश सत्ता शीर्ष के लिए गत सप्ताह बहुत ही अहम् साबित हुआ, जब भाजपा के केन्द्रीय शीर्ष संगठन ने दतिया उपचुनाव घोषणा के साथ प्रत्याशी चयन और उसके बाद के घटनाक्रम का नजारा जिस अनोखे और चेतावनीभरे अंदाज में खत्म कर दिया। इस पूरे घटनाक्रम ने मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार के अप्रत्याशित पतन के बाद फिर सत्ता में आई भाजपा के प्रदेश सत्ता शीर्ष को लेकर विगत आठ सालों से चल रही असफल बगावती खुसुर-फुसुर को भी खत्म कर दिया। मध्यप्रदेश में भाजपाई सत्ता के ये बग़ावती खुसुर-फुसुर हालांकि दिग्विजय सरकार को नेस्तनाबूद कर मुख्यमंत्री बनी उमा भारती के भी मजबूरन इस्तीफे के बाद तख्तनशीन हुए स्व. बाबूलाल गौर की ताजपोशी के साथ ही शुरू हो गए थे। परन्तु इस पर एक बारगी रोक तब लग गई थी जब केन्द्रीय नेतृत्व द्वारा प्रदेश संगठन के मार्फत शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बना दिया गया था, परन्तु उनके ही दूसरे कार्यकाल के साथ ही यह बगावती खुसुर-फुसुर फिर शुरू हो गई और तीसरे कार्यकाल तक तो अपने पूरे शबाब पर आ गई थी। मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री की स्थिति को लेकर माहौल ऐसा हो गया था कि भोपाल से कोई दिल्ली जाता तो कयासों के दौर शुरू हो जातें और सुर्खियां चलने लगती की मामा तो ग्यो या दिल्ली से कोई भी, जी हां कोई भी भोपाल आता तो सुर्खी कुछ बडा होने वाला है की बनती, और बनें भी क्यों नहीं एक, दो, तीन, चार नहीं बल्कि पांच-पांच क्षत्रप ताल ठोंक रहे थे, जिनमें तो दो दिल्ली दरबार में ही बैठे थे। याद होगा शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्रित्व काल के अंतिम समय में दिल्ली दरबार के नरेंद्र सिंह तोमर, प्रहलाद पटेल के साथ भोपाल दरबार से कैलाश विजयवर्गीय, नरोत्तम मिश्रा, के सुर्ख तनातनी सुर चल रहे थे और इनके अलावा दिल्ली और भोपाल दोनों जगह समान रूप से सक्रिय सांसद और तात्कालीन प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा का मन भी कुलांचे भर रहा था तथा इनके अलावा बीच-बीच में कुछेक नाम और भी चटक रहे थे। लेकिन तब से ही दिल्ली दरबार की मंशा कुछ और ही बन गई थी। वहीं बार बार शिवराज सिंह भी कितना जोर लगाते, इन धुरंधर पंच दिग्गजों के सामने अठारह के चुनाव ने वैसे ही उनके नबंर कम कर दिए थे। वो तो भाग्य रहा उनका कि ज्योतिरादित्य सिंधिया की बग़ावत से कांग्रेस का छींका टूटा और फिर मुख्यमंत्री पद उनकी झोली में आ गिरा। परन्तु तब तक केन्द्र ने अपनी मंशा बना ली थी। जो कि तेइस के चुनाव घोषणा से पहले ही इन्दौर में अड़तालीस घंटे के शार्ट नोटिस पर आयोजित एक वृहद कार्यकर्ता सम्मेलन में अमित शाह ने अप्रत्यक्ष रूप से जाहिर कर दी थी। अमित शाह ने अपने पौन घंटे से ज्यादा के संबोधन में शिवराज सिंह चौहान की मंच पर उपस्थिति के बावजूद पंडाल में मौजूद कार्यकर्ताओं से बार-बार कहा था कि हमें केन्द्र में नरेन्द्र भाई मोदी के हाथ मजबूत करने के लिए भोपाल में बीजेपी की सरकार बनानी है, एक बार भी उन्होंने शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में सरकार बनाने का नहीं कहा था, जबकि शिवराज सिंह चौहान मंच पर उनके पास ही थे। उधर केन्द्र से प्रदेश सत्ता शीर्ष पर आने को लालायित नरेंद्र सिंह तोमर और प्रहलाद पटेल दोनों को विधानसभा चुनाव लड़ने का आदेश दे, दोनों के ही राग-सुर बदल दोनों को ही भोपाल की सत्ता राजनीति के किनारे ले आए। हालांकि तेईस के चुनाव के बाद उपरोक्त पांचों दावेदारों के साथ छठवां नाम कमलनाथ सरकार गिरा बीजेपी में शामिल हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया का भी जुड़ गया था। परन्तु आम जनता में तोल-मोल की राजनीति का गलत संदेश ना जाने देने की पार्टी की दूरदर्शी सोच के चलते उन्हें दिल्ली में ही रोक लिया और यह बात उन्हें भी अच्छी तरह समझ में आ गई, अगले ही विधानसभा उपचुनाव और लोकसभा चुनाव में। वहीं विधानसभा चुनाव में नरोत्तम मिश्रा की अनसोची हार ने उनका दावा खत्म कर दिया था। परन्तु बाकी तों संघ की शाखाओं में खिलाए जाने वाले खेल में शिवाजी को खेल रहे थे, और जब श्यामला हिल्स बंगले में किसको बैठाया जाए इसको चुनने की तैयारियां हो रही थीं तो वे विश्वमोहिनी स्वयंवर में नारद मुनि की तरह अगली कतार में बैठे उछल रहे थे, परन्तु शीर्ष संगठन की माया के चलते प्रदेश की सत्ता सुंदरी ने जय माला डाली मोहन के गले में और इस तरह मध्यप्रदेश में चल रहे बगावती सुरों पर प्रारंभिक नकेल लगाते केन्द्र ने तेईस के विधानसभा चुनाव बाद भोपाल दरबार गठन के सम्पूर्ण सूत्र अपने हाथ में लेते उज्जैन के मोहन यादव को मुखिया बना भोपाल के श्यामला हिल्स के बंगले में बैठा दिया। उधर नरेंद्र सिंह तोमर को विधानसभा अध्यक्ष बना उन्हें इस अधूरी खुसुर-फुसुर से अलग कर लिया जिससे एक बारगी मध्यप्रदेश की सत्ता राजनीति में ठहराव आ गया, और बाकी के बगावती सुर पुनः शुरूआती आलाप की स्थिति में आ शांत हो गए। परन्तु कालान्तर में यह आलाप फिर धीरे-धीरे राग पकड़ने लगा तो केन्द्र की पेशानी पर भी विचार के बल पड़े और जब मौका मिला दतिया उप चुनाव का तो उसने यह अध्याय जहां से शुरू हुआ था वहीं पर धूमधाम तथा हर्षोल्लास से खत्म कर दिया तथा इसके साथ प्रदेश में चल रहे इस बगावती पुराण की भी पूर्णाहुति हो गई। दतिया उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटे जाने के बाद जो भी घटनाक्रम हुआ वो सबने देखा कि किस तरह फार्म लेने के बाद भी नरोत्तम मिश्रा की जगह केन्द्र के निर्देश पर ही अभिषेक तिवारी को प्रत्याशी घोषित किया और उसके बाद मंच पर से भावुक नरोत्तम मिश्रा ने उनको जिताने का संकल्प लिया। तथा कल अपने एक बयान में उन्होंने यह स्वीकारोक्ति भी कर ली कि मेरा टिकट उपर से कटा, अभिषेक के बस की बात नहीं थी। अब गेंद पूरी तरह से मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के पाले में और उनके नियंत्रण में ही है, हालांकि उनमें सरकार बनाने के बाद से ही दिख रहे जबरदस्त आत्मविश्वास के साथ उनकी वॉडी लैंग्वेज से ही यह स्पष्ट दिखाई दे रहा था कि पांच साल तक तो कुछ होना जाना नहीं है फिर भी जिस तरह केन्द्र ने उनके पथ को निष्कंटक किया उससे उन्हें और बल मिला है, आखिर बीजेपी के केन्द्रीय केन्द्र को वर्तमान राजनीति में चाणक्य की उपमा यूं ही नहीं दी गई है। अब मुख्यमंत्री मोहन यादव को मध्यप्रदेश की राजनीति के चाणक्य नीति द्वारा निर्मित निष्कंटक मार्ग पर चलते एक बार फिर मध्यप्रदेश में सत्ता शीर्ष पर काबिज रहते नेतृत्व का रिकार्ड बनाना है। उम्मीद ही नहीं विश्वास है शेष समय सुकून से गुज़रेगा।