- भविष्य की ऊर्जा हमारे साथ चल रही थी अटल अक्षय ऊर्जा भवन से ग्रेटर नोएडा के NETRA तक एक यात्री की आँखों-देखी आज का दिन मेरे लिए केवल एक यात्रा का दिन नहीं है। यह उस भविष्य की यात्रा है जिसकी चर्चा हम वर्षों से कागजों, सम्मेलनों और सरकारी योजनाओं में करते आए हैं। आज मैं स्वयं उस भविष्य उज्जवल ऊर्जा हाइड्रोजन बस का एक यात्री हूँ। नई दिल्ली के लोधी रोड स्थित अटल अक्षय ऊर्जा भवन से ग्रेटर नोएडा स्थित NETRA तक भविष्य की ऊर्जा हाइड्रोजन ऊर्जा से संचालित बस थी। बस में बैठते ही मन में पहला विचार यही आया कि जिस ऊर्जा परिवर्तन की बातें हम रोज करते हैं वह अब केवल प्रयोगशाला या नीति-पत्रों तक सीमित नहीं रह गया है। वह हमारे सामने सड़क पर चल रहा है और आज हम उसी में बैठकर अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे हैं। अटल अक्षय ऊर्जा भवन से इस यात्रा का प्रारम्भ होना भी अपने आप में महत्वपूर्ण है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय का मुख्यालय इसी भवन में है। यही वह संस्थागत परिसर है जहाँ देश की अक्षय ऊर्जा और हरित हाइड्रोजन से जुड़ी नीतियों और योजनाओं को दिशा मिलती है। एक तरफ नीति का केंद्र और दूसरी तरफ उसी नीति से निकलकर सड़क पर दौड़ती हाइड्रोजन बस। इस संयोग ने यात्रा को मेरे लिए और भी अर्थपूर्ण बना दिया। बस धीरे-धीरे आगे बढ़ती है। सामान्य बसों की तरह इंजन की तेज आवाज नहीं। धुएँ का कोई गुबार नहीं। सड़क वही है। यातायात वही है। दिल्ली की वही भागदौड़ है। फर्क केवल इतना है कि इस बस की ऊर्जा का चरित्र अलग है। यही अंतर इस यात्रा को विशेष बना देता है। पेट्रोल और डीजल आधारित परिवहन ने देश की आर्थिक और सामाजिक गति को तेज किया है। इसके साथ वायु प्रदूषण और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता की चुनौती भी हमारे सामने खड़ी हुई है। ऐसे समय में हाइड्रोजन आधारित परिवहन एक नए विकल्प के रूप में दिखाई देता है। फ्यूल सेल आधारित हाइड्रोजन वाहन में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की विद्युत- रासायनिक प्रक्रिया से बिजली उत्पन्न होती है। यही बिजली वाहन को चलाती है। इस प्रक्रिया का प्रमुख उप-उत्पाद पानी होता है। यानी जिस बस में हम बैठे हैं वह यात्रियों को लेकर सड़क पर दौड़ रही है मगर पारंपरिक ईंधन से निकलने वाला धुआँ इसके पीछे नहीं है। एक यात्री के लिए इस तकनीक को समझने का इससे सरल तरीका शायद कोई दूसरा नहीं हो सकता। भारत ने राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के अंतर्गत परिवहन क्षेत्र में पायलट परियोजनाओं को गति दी है। जुलाई 2026 में 12 पायलट परियोजनाओं को आगे बढ़ाया गया है। इनके तहत 21 मार्गों पर 70 हाइड्रोजन चालित वाहनों को लगाया जाना है। इनमें 27 बसें और 43 ट्रक शामिल हैं। इसके साथ 16 हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग स्टेशन स्थापित किए जाने हैं। इन परियोजनाओं के लिए लगभग 410.77 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता निर्धारित की गई है। इन मार्गों में ग्रेटर नोएडा–दिल्ली– आगरा मार्ग भी शामिल है। इस तथ्य से आज की यात्रा का महत्व और बढ़ जाता है। जिस तकनीक की चर्चा सरकारी योजनाओं में हो रही है उसी तकनीक में आज हम यात्री बनकर दिल्ली से ग्रेटर नोएडा की ओर बढ़ रहे हैं। आँकड़ों की अपनी भाषा होती है। मगर कभी-कभी एक यात्रा हजारों शब्दों से अधिक कह देती है। आज की यह यात्रा उन्हीं आँकड़ों को आँखों-देखा अनुभव बना रही है। दिल्ली की सड़कों को पीछे छोड़ते हुए बस ग्रेटर नोएडा की ओर बढ़ती है। बाहर सड़क पर वाहनों की लंबी कतारें हैं। कहीं निर्माण कार्य है। कहीं सामान्य यातायात का शोर है। मगर इस सबके बीच हमारी बस का सफर अपेक्षाकृत शांत है। मेरे मन में एक सवाल बार-बार उठता है कि आखिर इस बस की ऊर्जा आती कहाँ से है?यही सवाल हमें NETRA तक ले जाता है। ग्रेटर नोएडा स्थित NTPC के NETRA परिसर में हाइड्रोजन मोबिलिटी और ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन से जुड़ा बुनियादी ढाँचा विकसित किया गया है। यहाँ जल को शुद्ध करके इलेक्ट्रोलिसिस की प्रक्रिया के माध्यम से हाइड्रोजन तैयार करने की व्यवस्था है। इसके बाद हाइड्रोजन को शुद्ध किया जाता है। उसे संपीड़ित और संग्रहित किया जाता है तथा फिर वाहनों में ईंधन के रूप में भरा जाता है। यानी सड़क पर दौड़ती बस के पीछे एक पूरा ऊर्जा तंत्र काम करता है। हाइड्रोजन बस केवल एक वाहन नहीं है। इसके पीछे उत्पादन है। शुद्धिकरण है। संपीड़न है। भंडारण है। रिफ्यूलिंग स्टेशन है। सुरक्षा व्यवस्था है। प्रशिक्षित मानव संसाधन है और सबसे महत्वपूर्ण है स्वच्छ ऊर्जा की वह सोच जो इस पूरी व्यवस्था को जोड़ती है। ऊर्जा परिवर्तन को हम अक्सर मेगावाट,गीगावाट, उत्पादन क्षमता,निवेश और कार्बन उत्सर्जन के आँकड़ों से समझते हैं। मगर आज बस की एक सीट पर बैठे हुए मुझे लगा कि ऊर्जा परिवर्तन का असली अर्थ इससे कहीं अधिक मानवीय है। किसी भी यात्रा में एक यात्री की पहली अपेक्षा है कि बस सुरक्षित हो। दूसरी अपेक्षा है कि सफर आरामदायक हो। तीसरी अपेक्षा है कि जिस हवा में हम साँस लेते हैं उस पर यात्रा का बोझ कम से कम पड़े। हाइड्रोजन आधारित परिवहन इन अपेक्षाओं को पूरा करने की क्षमता रखता है। मगर किसी भी नई तकनीक के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही होता है कि वह प्रयोगशाला से निकलकर बड़े पैमाने पर आम आदमी तक कब और कैसे पहुँचेगी। यही कारण है कि पायलट परियोजनाएँ महत्वपूर्ण हैं। इनके माध्यम से वास्तविक परिस्थितियों में वाहन की क्षमता, प्रदर्शन,सुरक्षा,रिफ्यूलिंग व्यवस्था और आर्थिक व्यवहार्यता को समझा जा रहा है। आज की हमारी यात्रा इसी सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा है। हाइड्रोजन बस सड़क पर चल रही है। मगर मन में कई सवाल भी साथ चल रहे हैं। हाइड्रोजन कैसे बनेगी। किस ऊर्जा से बनेगी। इसकी लागत कितनी होगी। कहाँ-कहाँ रिफ्यूलिंग स्टेशन बनेंगे। वाहनों की सुरक्षा व्यवस्था कैसी होगी। बड़े पैमाने पर उत्पादन होने पर इसकी कीमत कितनी होगी। इन सवालों के साथ उम्मीद की एक नई किरण भी दिखाई देती है। क्योंकि हाइड्रोजन के पीछे केवल एक बस नहीं है। इसके पीछे पूरी ऊर्जा व्यवस्था को बदलने की संभावना है। राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का उद्देश्य भारत को हरित हाइड्रोजन के उत्पादन,उपयोग और निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाना है। मिशन के लिए कुल 19,744 करोड़ रुपये का परिव्यय निर्धारित किया गया है। इसका लक्ष्य वर्ष 2030 तक हरित हाइड्रोजन के उत्पादन और इससे जुड़े पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को विकसित करना है। परिवहन क्षेत्र की पायलट परियोजनाएँ इसी बड़े लक्ष्य की प्रयोगात्मक कड़ी हैं। इसका अर्थ है कि आज जिस बस में हम यात्री बनकर बैठे हैं वह अकेली बस नहीं है। वह भारत के ऊर्जा परिवर्तन की एक चलती-फिरती प्रयोगशाला है। अटल अक्षय ऊर्जा भवन से NETRA तक की यह यात्रा अपने आप में प्रतीकात्मक भी है। एक तरफ नीति और योजना का केंद्र। दूसरी तरफ तकनीक का प्रयोग और प्रदर्शन करने वाला परिसर। और इनके बीच सड़क पर दौड़ती हाइड्रोजन बस। मानो नीति से तकनीक और तकनीक से जनता तक ऊर्जा परिवर्तन की पूरी यात्रा हमारी आँखों के सामने हो रही हो। भारत ने अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार किया है। सौर ऊर्जा,पवन ऊर्जा, बैटरी स्टोरेज,इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और अब हरित हाइड्रोजन मिलकर देश के ऊर्जा भविष्य की नई तस्वीर बना रहे हैं। हाइड्रोजन का महत्व इसलिए भी बढ़ता है क्योंकि परिवहन के प्रत्येक क्षेत्र के लिए एक ही तकनीक पर्याप्त समाधान नहीं हो सकती। लंबी दूरी और भारी परिवहन के कुछ क्षेत्रों में हाइड्रोजन एक महत्वपूर्ण विकल्प बन सकता है। आज बस में बैठे हुए यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या आने वाले वर्षों में दिल्ली, नोएडा,ग्रेटर नोएडा और देश के दूसरे शहरों की सड़कों पर ऐसी बसें सामान्य रूप से दिखाई देंगी। इसका उत्तर आज देना जल्दबाजी होगी। तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाने से पहले लागत,हाइड्रोजन की उपलब्धता, रिफ्यूलिंग नेटवर्क,वाहनों की विश्वसनीयता,सुरक्षा और आर्थिक व्यवहार्यता जैसे अनेक पहलुओं को लगातार परखा जाना है। मगर दिशा स्पष्ट है। 21 मार्गों पर 70 हाइड्रोजन चालित वाहनों और 16 रिफ्यूलिंग स्टेशनों की योजना यह बताती है कि भारत इस तकनीक को केवल चर्चा का विषय बनाकर नहीं रखना चाहता। हाइड्रोजन आधारित परिवहन भारत के लिए बिल्कुल नया विचार नहीं है। वर्ष 2023 में देश की पहली ग्रीन हाइड्रोजन फ्यूल सेल बस को दिल्ली के कर्तव्य पथ से रवाना किया गया था। उस समय यह तकनीक भविष्य की संभावना के रूप में हमारे सामने थी। आज वर्ष 2026 में उसी भविष्य की तकनीक में बैठकर दिल्ली से ग्रेटर नोएडा तक सफर करना अपने आप में एक अलग अनुभव है। मार्च 2025 में राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के तहत पाँच परिवहन पायलट परियोजनाओं में 37 हाइड्रोजन चालित बसों और ट्रकों तथा नौ हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग स्टेशनों को मंजूरी दी गई थी। अब जुलाई 2026 में पायलट परियोजनाओं का विस्तार 70 वाहनों,21मार्गों और 16 रिफ्यूलिंग स्टेशनों तक पहुँचना बताता है कि देश इस तकनीक को प्रयोगशाला से सड़क तक लाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सड़क परिवहन के साथ रेल क्षेत्र में भी हाइड्रोजन तकनीक को आजमाया जा रहा है। इसका अर्थ साफ है कि स्वच्छ हाइड्रोजन को भविष्य की परिवहन व्यवस्था के एक संभावित महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। ऊर्जा का अर्थ केवल बिजली पैदा करना नहीं है। ऊर्जा का अर्थ है विकास की गति। आर्थिक आत्मनिर्भरता। रोजगार। पर्यावरण सुरक्षा और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य। इसीलिए आज की यह यात्रा मेरे लिए एक साधारण बस यात्रा नहीं है। बस की खिड़की से बाहर बदलता हुआ दिल्ली- एनसीआर दिखाई देता है। भीतर बैठकर लगता है कि भारत अपनी ऊर्जा यात्रा में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। कभी भाप का इंजन औद्योगिक क्रांति का प्रतीक था। फिर पेट्रोल और डीजल ने सड़क परिवहन की दुनिया बदल दी। बिजली ने परिवहन को नया विकल्प दिया। अब हाइड्रोजन उस परिवर्तन की अगली कड़ी के रूप में सामने है। मगर इस परिवर्तन की असली परीक्षा तकनीक नहीं बल्कि उसका आम आदमी तक पहुँचना है। यदि हाइड्रोजन से चलने वाली बसें सुरक्षित, विश्वसनीय,आर्थिक रूप से व्यवहार्य और बड़े पैमाने पर उपलब्ध हो सकीं तो सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्र में यह बड़ा परिवर्तन ला सकती हैं। इससे भी बड़ी बात यह होगी कि हमारी ऊर्जा व्यवस्था धीरे-धीरे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता से स्वच्छ ऊर्जा की ओर आगे बढ़ेगी। NETRA की ओर बढ़ते हुए मेरे मन में यही विचार है कि किसी तकनीक की सफलता का अंतिम पैमाना केवल उसकी मशीन नहीं होती। असली सफलता तब होती है - जब वह आम आदमी की जिंदगी को बेहतर बनाए। आज हम एक यात्री हैं। कल शायद हमारे बच्चे ऐसी बसों में रोज सफर करेंगे। संभव है कि उनके लिए हाइड्रोजन बस उतनी ही सामान्य हो जितनी आज हमारे लिए सीएनजी या इलेक्ट्रिक बस है। शायद उन्हें यह भी याद न रहे कि कभी शहरों की बसों से काला धुआँ निकलना सामान्य बात थी। आज की हमारी यह यात्रा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हम केवल अटल अक्षय ऊर्जा भवन से NETRA तक नहीं जा रहे हैं। हम उस भारत की ओर बढ़ रहे हैं ,जहाँ ऊर्जा का अर्थ केवल खपत नहीं बल्कि स्वच्छता, आत्मनिर्भरता और सतत विकास होगा। बस आगे बढ़ रही है। सड़क पर कोई धुआँ नहीं है। दिल्ली- एनसीआर की भीड़ अपनी गति से चल रही है। मगर इस बस के भीतर बैठा एक यात्री महसूस कर रहा है कि ऊर्जा का भविष्य अब दूर दिखाई देने वाली कोई चीज नहीं रह गया है। वह हमारे सामने है। वह सड़क पर है। और आज वह हमारे साथ चल रहा है। अटल अक्षय ऊर्जा भवन से NETRA तक की यह यात्रा केवल दूरी तय करने की यात्रा नहीं है। यह उस भारत की झलक है,जहाँ स्वच्छ ऊर्जा प्रयोगशाला से निकलकर सड़क पर आती है और आम आदमी उसमें बैठकर उसके भविष्य को महसूस करता है। भविष्य अभी पूरी तरह आया नहीं है। मगर आज की यह हाइड्रोजन बस बता रही है कि वह हमारे साथ चलना शुरू कर चुका है। (स्वतंत्र पत्रकार व स्तम्भकार) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) ईएमएस / 20 अगस्त 26