लेख
20-Aug-2026
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सुनो साधो! कलियुग का सबसे बड़ा कौशल है, उत्तर न हो तो प्रश्न को ही अपराध बना दो। द्वापर में कृष्ण बाँसुरी बजाते थे तो वृंदावन की हवा तक ठिठककर सुनती थी। गोपियाँ खिंची चली आती थीं, गायें चरना भूल जाती थीं और यमुना की लहरें जैसे अपनी चाल धीमी कर लेती थीं। नारद मुनि ने एक दिन कृष्ण से पूछा, “प्रभु, आपकी बाँसुरी में ऐसा क्या जादू था कि सब काम छोड़कर गोपियाँ चली आती थीं? आज तो कोई कुछ कहे, लोग सुनने से पहले यह पूछते हैं कि कहने वाला कौन है?” कृष्ण मुस्कुराए, “नारद, तब लोग धुन में मगन होकर उसे सुनते थे, अब धुन सुनने से पहले धुन बजाने वाले की पहचान देखी जाती है।” नारद ने अपनी वीणा पर राग छेड़ा। सामने एक भैंस खड़ी थी। उसने गर्दन उठाई, नारद को देखा और फिर इत्मीनान से पगुराने लगी। नारद ने पूछा,“प्रभु, इसे संगीत सुनाई नहीं दे रहा?” कृष्ण बोले , “सुनाई दे रहा है, नारद! पर इसे अब अपनी ही धुन अधिक प्रिय है। इसे जाज सुनाओ तो दूध बढ़ने लगता है, वीणा सुनाओ तो जुगाली।” नारद ने विस्मय से भैंस को देखा। कृष्ण बोले , “यही कलियुग है, हर कोई अपनी ही अनुगूँज सुनना चाहता है और अपनी प्रतिध्वनि को ही सत्य समझ बैठा है।” पुराने जमाने में भैंस के लिए बीन हो, शास्त्रीय संगीत हो या पाश्चात्य धुन, सब बराबर थे। उसके संसार का संगीत चारे की खड़खड़ाहट से शुरू होकर जुगाली पर समाप्त होता था। मगर अब भैंस ने भी समय के साथ तरक्की कर ली है। गले की घंटी माइक में बदल गई है। अब भैंस सुनना नहीं, सुनाना चाहती है। भैंस ही क्या, सड़क के कुत्तों , से लेकर चुनावी मेंढक , काकरोच तक माइक पर बोल रहे हैं। फर्क इतना है कि पहले काकरोच अँधेरे में छिपते थे, अब इकठ्ठा हो कर घरों की सफाई पर व्याख्यान देते हैं। सब सुना रहे हैं, सुन कोई नहीं रहा। सरकारें सुनना कम, बताना अधिक पसंद करती हैं, विपक्ष सुनना कम, बताना अधिक पसंद करता है, जनता कुछ जनहितकारी सुनना चाहती है, मगर उसके कानों तक पहुँचने से पहले ही हर बात का अपना-अपना लाउडस्पीकर बजाता नजर आता है। जमाना सचमुच बदल गया है। अब भैंसों के सींगों पर फूल नहीं, फॉलोअर लटकते हैं और पगुराने को नया सम्मानजनक नाम मिल गया है, “जनभावना।” तथ्य कोई नहीं सुनता, जनभावना सुनता है। प्रमाण रखिए, उसे देखने-समझने की जगह कोई परंपरा का संदूक खोल देगा। आप सवाल पूछिए, सामने वाला आपके सवाल की नीयत पूछने लगेगा। आप कहेंगे,“इस समस्या का समाधान क्या है?” वह कहेगा, “पहले यह बताओ कि समस्या बताने वाले तुम कौन होते हो?” आप उत्तर माँगेंगे तो विषय बदल दिया जाएगा। विषय न बदले तो आवाज ऊँची कर दी जाएगी। आवाज भी काम न आए तो आपके चरित्र की पुरानी फाइल खुल जाएगी। उत्तर न हो तो प्रश्नकर्ता को कटघरे में खड़ा कर दो, समस्या अपने आप निर्दोष हो जाती है। नारद यह सारा वृत्तांत सुनकर चिंतित हुए। उन्होंने कृष्ण से पूछा, “प्रभु, यह लीला केवल राजनीति के तबेले में है या और भी कहीं?” कृष्ण बोले, “नारद, कलियुग में यह सर्वव्यापी है।” शिक्षा वन के सामने बीन बजाओ तो कोई पुराने परिणामों की गठरी खोल देगा। विज्ञान जगत के सामने तर्क रखो तो दादा जी का नुस्खा प्रयोगशाला को मात दे देगा। साहित्य की अकादमी के सामने सरस्वती की वीणा बजाओ तो पूछा जाएगा, “ आखिर पढ़ते कितने हैं?” सोशल मीडिया पर डमरू बजाओ तो एक भैंस पगुराएगी, दूसरी उसे साझा करेगी, तीसरी उसे सत्यापित करेगी और चौथी घोषणा कर देगी, “देखिए, जनता का अभिमत क्या है!” बेचारी जनता को पता भी नहीं होगा कि वह कब और क्या बोल गई। समय का यह भी एक चमत्कार है, अब विचार प्रमाण से नहीं, प्रसार से शक्तिशाली होता है। जिस बात को हजार लोग साझा कर दें, वह सच लगने लगती है, जिसे कोई पढ़े ही नहीं, उसका सत्य भी अनाथ हो जाता है। नारद ने अपनी वीणा किनारे रख दी। “प्रभु, फिर तो कोई धुन बजाना ही व्यर्थ है?” कृष्ण ने कहा, “नारद, बीन इसलिए नहीं बजाई जाती कि भैंस नाचे। बीन इसलिए बजती है कि ध्वनि में राग बचा रहे, शोर में संगीत बचा रहे।” नारद बोले, “लेकिन यदि कोई सुनना ही न चाहे?” कृष्ण हँसे “तो धुन बदलो, संगीत का सत्य नहीं।” सुनो साधो! व्यंग्यकार की दशा भी कुछ ऐसी ही है। वह आईना लेकर खड़ा होता है और सामने वाला चेहरा देखने के बजाय आईने की लकड़ी, फ्रेम, आकार-प्रकार और बनाने वाले की नीयत पर बहस करने लगता है। आईना बेचारा सोचता रह जाता है कि उसने आखिर ऐसा क्या कर दिया! आईने की सबसे बड़ी विडंबना यही है, चेहरा अपना होता है, दोष आईने का बताया जाता है। फिर भी बीन बजनी चाहिए। क्योंकि जिस समाज में असुविधाजनक प्रश्न पूछना अपराध समझ लिया जाए, वहाँ बीन केवल संगीत नहीं रहती, वह चेतावनी बन जाती है। भैंस पगुराए, पगुराने दीजिए। तबेलों में तालियाँ भी बजें, घंटियाँ भी बजें, माइक भी गरजे। मगर बीन वाले को अपनी शाश्वत मूल्य वाली धुन याद रहनी चाहिए। संकट भैंस के पगुराने में नहीं है। संकट उस दिन होगा, जब बीन बजाने वाला भीड़ देखकर अपनी बीन रख देगा और कहेगा, “चलो, मैं भी पगुरा लेता हूँ।” उस दिन शायद पगुराहट को ही संगीत घोषित कर दिया जाएगा और जो सचमुच संगीत बजा रहा होगा, उसे शोर करने वाला कहा जाएगा। और सुनो साधो, भैंस के आगे बीन बजाना व्यर्थ हो सकता है, लेकिन बीन बजाना छोड़ देना अनर्थ होगा । भैंस को शायद धुन न सुनाई दे, मगर इतिहास सुनता है कि उस समय कौन बीन बजा रहा था और कौन चारा खाकर पगुरा रहा था। सुनो साधो! जब पगुराहट को संगीत और शोर को संवाद समझ लिया जाए, तब बीन बजाना ही व्यंग्यकार का धर्म है। (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) ईएमएस / 20 अगस्त 26