सार्वजनिक जीवन में असहमति कोई असामान्य बात नहीं है। लोकतंत्र में विचारों का टकराव होना चाहिए, बहस होनी चाहिए और जरूरत पड़े तो तीखी आलोचना भी होनी चाहिए। लेकिन जब तर्क की जगह निजी जिंदगी, चरित्र, देह और अपमानजनक विशेषण ले लेते हैं, तब बहस केवल अपना स्तर नहीं खोती, बल्कि सार्वजनिक संवाद की मर्यादा पर भी सवाल खड़ा करती है। भाजपा सांसद और अभिनेत्री कंगना रनौत तथा योगगुरु बाबा रामदेव के बीच चल रहा विवाद इसी विडंबना का नया उदाहरण है। विवाद की शुरुआत कंगना के उस बयान से हुई जिसमें उन्होंने जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन और नई पीढ़ी के संदर्भ में ‘गटर जेनरेशन’ यानी ‘गटर पीढ़ी’ जैसी भाषा का इस्तेमाल किया था। इस टिप्पणी की आलोचना स्वाभाविक थी। युवा पीढ़ी के एक हिस्से के आचरण या किसी आंदोलन में शामिल लोगों के व्यवहार पर सवाल उठाने और पूरी पीढ़ी को एक अपमानजनक विशेषण से परिभाषित करने में बड़ा फर्क है। कंगना बाद में यह सफाई देती रही हैं कि उनका निशाना पूरी नई पीढ़ी नहीं, बल्कि युवाओं का एक खास वर्ग था। लेकिन इस सफाई से मूल सवाल खत्म नहीं होता। आखिर किसी लोकतांत्रिक समाज में असहमति जताने के लिए ‘गटर’ जैसी भाषा क्यों जरूरी हो जाती है? युवा पीढ़ी से शिकायत हो सकती है, उसके तौर-तरीकों पर बहस हो सकती है, सामाजिक माध्यमों की संस्कृति की आलोचना की जा सकती है। मगर पूरी पीढ़ी को नैतिक रूप से घटिया बताना किसी गंभीर राजनीतिक या सामाजिक विमर्श का विकल्प नहीं हो सकता। बाबा रामदेव ने कंगना की टिप्पणी पर आपत्ति जताई। उन्होंने इसे बिगड़ी या विकृत मानसिकता का संकेत बताया और कंगना के बयान पर सवाल उठाए। यहां तक उनकी आलोचना को सार्वजनिक बहस का हिस्सा माना जा सकता था। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब किसी महिला सार्वजनिक व्यक्तित्व के विचारों का जवाब उसके निजी जीवन, चरित्र या व्यक्तिगत अतीत को कठघरे में खड़ा करके दिया जाने लगे। कंगना ने भी जवाब देने में संयम का रास्ता नहीं चुना। उन्होंने सामाजिक माध्यम पर बाबा रामदेव से कहा कि वे उनकी ‘जवानी’ या ‘शयनकक्ष’ के बारे में कल्पना न करें और उनके चरित्र पर टिप्पणी न करें। साथ ही उन्होंने पतंजलि से जुड़े उन न्यायिक विवादों का उल्लेख किया, जिनमें भ्रामक विज्ञापनों और चिकित्सकीय दावों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की कार्रवाई हुई थी। यहीं इस पूरे प्रकरण की असली विडंबना सामने आती है। जिस विवाद की शुरुआत युवाओं की भाषा और आचरण को लेकर हुई थी, वह कुछ ही समय में दो सार्वजनिक व्यक्तित्वों की निजी जिंदगी और चरित्र पर पहुंच गया। यानी जिस ‘गटर’ भाषा की आलोचना की जा रही थी, बहस उसी के आसपास घूमने लगी। सार्वजनिक जीवन में यह प्रवृत्ति नई नहीं है। राजनीति, सिनेमा, धर्म और सामाजिक माध्यमों के मेल ने एक ऐसा सार्वजनिक क्षेत्र बना दिया है जहां विचार से ज्यादा बयान की उत्तेजना बिकती है। जितना तीखा वाक्य, उतनी अधिक चर्चा। जितना व्यक्तिगत हमला, उतनी अधिक लोगों की दिलचस्पी। परिणाम यह कि संवाद धीरे-धीरे तर्क से हटकर तमाशे में बदलता जा रहा है। कंगना रनौत केवल अभिनेत्री नहीं हैं; वे निर्वाचित सांसद भी हैं। इसलिए उनके शब्दों की जिम्मेदारी एक सामान्य सामाजिक माध्यम उपयोगकर्ता से अधिक है। उन्हें किसी पीढ़ी की आलोचना करनी है तो वह आंकड़ों, अनुभवों और तर्क के आधार पर कर सकती हैं। छात्र आंदोलन में उन्हें अनुशासनहीनता दिखाई देती है तो उस पर बात हो सकती है। सामाजिक माध्यमों पर युवाओं की भाषा से आपत्ति है तो उस पर बहस हो सकती है। लेकिन ‘गटर जेनरेशन’ जैसे शब्द किसी निर्वाचित प्रतिनिधि की आलोचनात्मक क्षमता को मजबूत नहीं करते, बल्कि उसे कमजोर करते हैं। इसी तरह बाबा रामदेव का सार्वजनिक प्रभाव केवल योग शिविरों तक सीमित नहीं है। वे लंबे समय से स्वास्थ्य, स्वदेशी, जीवनशैली और सामाजिक मूल्यों पर सार्वजनिक राय बनाते रहे हैं। ऐसे व्यक्ति से अपेक्षा और भी अधिक होती है कि वह किसी महिला या राजनीतिक व्यक्तित्व की आलोचना करते समय उसके निजी जीवन और चरित्र की ओर न जाए। किसी के विचार को गलत बताने के लिए उसके निजी जीवन की पड़ताल जरूरी नहीं होती। यहां एक और महत्वपूर्ण बात है। कंगना ने अपने जवाब में पतंजलि से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के मामले का उल्लेख किया। वर्ष 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने पतंजलि के भ्रामक विज्ञापनों से जुड़े मामले में बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही की थी और बाद में उनकी माफी स्वीकार की गई। इसलिए कंगना का यह संदर्भ पूरी तरह अफवाह पर आधारित नहीं था। लेकिन किसी न्यायिक कार्रवाई का होना भी इस बात का प्रमाण नहीं कि उससे जुड़े व्यक्ति के चरित्र पर हर तरह की निजी टिप्पणी उचित हो जाती है। अदालत का फैसला तथ्य और कानून के दायरे में होता है, सामाजिक माध्यम की बहस अक्सर आरोप और व्यंग्य के दायरे में चली जाती है। यही फर्क समझना आज के सार्वजनिक विमर्श की सबसे बड़ी जरूरत है। किसी व्यक्ति की आलोचना और उसके चरित्रहनन के बीच एक महीन लेकिन निर्णायक रेखा होती है। आलोचना व्यक्ति के सार्वजनिक काम, विचार और आचरण से जुड़ी होती है; चरित्रहनन उसकी निजी जिंदगी को हथियार बना देता है। लोकतंत्र की सेहत इस बात पर निर्भर करती है कि हम इस रेखा को कितना बचा पाते हैं। विडंबना यह भी है कि यह विवाद उस समय सामने आया है जब छात्र, युवा और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवाल देश के राजनीतिक विमर्श के केंद्र में हैं। परीक्षा व्यवस्था, रोजगार, शिक्षा की गुणवत्ता, प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दे करोड़ों परिवारों को प्रभावित करते हैं। ऐसे समय में नई पीढ़ी को ‘गटर’ कहकर खारिज करना उतना ही अनुचित है, जितना युवाओं की बेचैनी को केवल उनकी उम्र या सामाजिक माध्यमों की आदतों से समझ लेना। हर पीढ़ी अपने समय की उपज होती है। आज की युवा पीढ़ी इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, बेरोजगारी, वैश्विक प्रतिस्पर्धा, बदलते पारिवारिक संबंध और लगातार बदलती सामाजिक अपेक्षाओं के बीच बड़ी हो रही है। उसकी भाषा अलग है, उसकी राजनीतिक भागीदारी का तरीका अलग है और उसकी असहमति के माध्यम भी अलग हैं। उसमें समस्याएं हैं तो संभावनाएं भी हैं। उसे केवल ‘गटर’ कहना उसके जटिल सामाजिक अनुभव को एक अपमानजनक शब्द में समेट देना है। लेकिन युवाओं की आलोचना भी जरूरी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि सामाजिक माध्यमों पर किसी के खिलाफ अश्लीलता, अपमान या हिंसक भाषा को स्वीकार कर लिया जाए। आंदोलन लोकतंत्र की ताकत हैं, लेकिन आंदोलन में भी जिम्मेदारी जरूरी है। युवाओं को भी यह समझना होगा कि अधिकारों के साथ कर्तव्य और असहमति के साथ मर्यादा जुड़ी है। यही बात सार्वजनिक जीवन के बड़े चेहरों पर भी लागू होती है। उनसे अपेक्षा इसलिए अधिक है क्योंकि उनकी आवाज लाखों लोग सुनते हैं। यदि वे ही बहस को निजी हमलों में बदल देंगे तो समाज के सामान्य संवाद से संयम की उम्मीद कैसे की जाएगी? कंगना और रामदेव का विवाद इसलिए महज दो चर्चित व्यक्तियों की जुबानी जंग नहीं है। यह उस सार्वजनिक संस्कृति का आईना है जिसमें विचारों का मुकाबला धीरे-धीरे व्यक्तियों के मुकाबले में बदल रहा है। पहले सवाल था कि युवा पीढ़ी कैसी है; अब सवाल यह बन गया है कि कौन किसके चरित्र पर टिप्पणी कर सकता है। पहले मुद्दा छात्र आंदोलन था; अब चर्चा ‘जवानी’ और ‘शयनकक्ष’ तक पहुंच गई है। यही सार्वजनिक विमर्श का पतन है। लोकतंत्र में किसी को भी कठघरे में खड़ा किया जा सकता है—लेकिन उसके विचारों और सार्वजनिक कर्मों के आधार पर। संसद में सवाल पूछे जाने चाहिए, अदालत में तथ्य रखे जाने चाहिए और समाज में तर्क से बहस होनी चाहिए। सामाजिक माध्यमों पर भी असहमति का अधिकार बना रहना चाहिए, मगर असहमति को अपमान में बदल देना लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का विस्तार नहीं, उसका अवमूल्यन है। ‘गटर जेनरेशन’ और ‘गटर छाप’ जैसी भाषा अंततः उसी सार्वजनिक संस्कृति को जन्म देती है जिसकी शिकायत करने वाले स्वयं करते हैं। अगर सार्वजनिक जीवन के लोग वास्तव में समाज को बेहतर भाषा देना चाहते हैं, तो उन्हें पहले अपनी भाषा की जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी। देश को नेताओं, अभिनेताओं, संतों और सार्वजनिक हस्तियों के बीच ऐसी बहस की जरूरत नहीं है जिसमें जीत इस बात से तय हो कि किसने दूसरे को ज्यादा निजी और ज्यादा अपमानजनक जवाब दिया। देश को उस बहस की जरूरत है जिसमें युवा पीढ़ी के सवालों का उत्तर मिले, छात्र आंदोलनों के कारणों पर चर्चा हो, शिक्षा व्यवस्था की कमियों पर बात हो और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का अर्थ केवल दूसरों के चरित्र का मूल्यांकन करना न रह जाए। आखिर ‘गटर’ से बाहर निकलने का रास्ता किसी दूसरे को गटर कहने से नहीं, भाषा को साफ करने और बहस को मुद्दे पर वापस लाने से ही निकलेगा। (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) ईएमएस / 20 अगस्त 26