भारत के कई राज्यों में छात्रों के आंदोलन सड़कों पर आ गए हैं। पिछले दो माह से जेन-जेड और जेन-अल्फ़ा के हजारों छात्र विभिन्न राज्यों में प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं। यह हवा शहरों से निकलकर गांव की तरफ पहुंच रही है। यह जो नई पीढ़ी है, यह अपने भविष्य और वर्तमान की जरूरत को ध्यान में रखते हुए प्रदर्शन के लिए सड़कों पर उतर रही है। ऐसे समय पर केंद्र सरकार, राज्य सरकारें तथा भाजपा वंदे मातरम और इतिहास के मुद्दों को उठाकर ऐसा लगता है कि आंख बंद करके वह इस बदलाव को अनदेखा कर रहे हैं। आज का युवा अपनी जरूरत और भविष्य को लेकर बहुत चिंतित है। सरकार इसकी गंभीरता को शायद समझ नहीं पा रही है, जिसके कारण यह आंदोलन दिन-प्रतिदिन बढ़ते चले जा रहे हैं। विभिन्न राज्यों में छोटे-छोटे बच्चे अपने स्कूल में शिक्षक नहीं होने, स्कूल में पानी की व्यवस्था नहीं होने, पंखा नहीं होने, स्कूल की बिल्डिंग जर्जर होने तथा खराब सड़कों के कारण सड़कों पर आ रहे हैं। पिछले 12 वर्षों में जो विकास की तस्वीर डबल इंजन की सरकारों द्वारा दिखाई जा रही थी उसके विपरीत अब गांव-गांव में चल रहे आंदोलन यह बता रहे हैं जब प्राइमरी और मिडिल स्कूलों की इतनी दयनीय हालत है, ग्रामीण सड़क पूरी तरह से खराब है, देश में एक लाख स्कूल बंद हो चुके हैं, जो स्कूल चल रहे हैं, उनका भगवान ही मालिक है। 12 से 16 साल के बच्चे जिस आक्रामक तरीके से आकर अपनी बात रख रहे हैं, सरकार और भाजपा इसे एक तरह से नजर अंदाज कर रही है। इतिहास के बल पर 40 करोड़ बच्चों को समझाया और बुझाया नहीं जा सकता है। उनके पास भविष्य के सब सपने हैं। करोड़ों युवा जो ग्रेजुएट हो चुके हैं, कई वर्षों से बेरोजगार हैं। ये कई तरह की भर्ती और प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग ले चुके हैं। हर परीक्षा के लिए बार-बार शुल्क चुकाते हैं। परीक्षा देने के लिए सैकड़ो किलोमीटर दूर जाते हैं। उनकी उम्र निकल रही है। इसके बाद भी उनके लिए नौकरी नहीं मिल पा रही है। इसी तरह से जो छात्र अभी मिडिल और हाई स्कूल में है उनके स्कूलों में टीचर नहीं है। पढ़ाई की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है। तरह-तरह की परेशानियां हैं। सरकार को समझना होगा मोबाइल युग की यह पीढ़ी सबसे ज्यादा समझदार है। रही सही कसर इंटरनेट, सोशल मीडिया, ग्रोक, एआई, गूगल इत्यादि प्लेटफार्म से यह बच्चे झूठ और सच को जानने में जरा भी देर नहीं करते हैं। यह बच्चे वर्तमान में जीना चाहते हैं। इनका इतिहास से कोई लेना देना नहीं है। यह अपने परिवार से भी तब तक जुड़े रहते हैं जब तक उनकी ज़रूरतें पूरी होती हैं। जरूरत पूरी नहीं होने पर यह अपने माता-पिता और परिवारजनों से भी विद्रोह करने की मुद्रा में होते हैं। पिछले कुछ वर्षों से धार्मिक ध्रुवीकरण के आधार पर भाजपा ने लगातार कई चुनाव जीत लिए हैं। भावात्मक रूप से लोगों को प्रभावित करने के लिए दशकों पुराने गडे़ मुर्दों को कब्र से निकाल कर राजनीति अब संभव नहीं रह गई है। इतिहास को सब अपने-अपने तरीके से अभी तक देख रहे थे, यह जो नई पीढ़ी आई है यह तुरंत गूगल, एआई और ग्रोक के प्लेटफार्म में जाकर सच और झूठ का पता लगा लेती है। इसमें भारतीय जनता पार्टी को जो सबसे बड़ा नुकसान हो रहा है वह यह है, जो नई पीढ़ी इतिहास को नहीं जानती थी पिछले वर्षों में उसे जिस तरह से बताया गया था उसी को उसने सच मान लिया था, लेकिन अब वह सच का पता लगाना सीख गई है। इस झूठ और सच के बीच में वह पडना भी नहीं चाहती है। उसकी आज की ज़रूरतें हैं, कल का भविष्य है इतिहास से उसे कुछ मिल नहीं रहा है। पिछले 12 वर्षों से देश में डबल इंजन की सरकारें हैं। समय-समय पर इन्हें बड़े-बड़े सपने दिखाए गए, लेकिन उनमें से कोई भी सपना इन 12 सालों में पूरा नहीं हुआ। कई राज्यों में तो 20 से 25 वर्ष से भाजपा की सरकारें हैं। ऐसी स्थिति में जेन-जेड और जेन-अल्फा ने भाजपा का शासन देखा है, सपने पूरे नहीं हो रहे और जो उन्हें दिखाया जा रहा वह सत्य से बहुत दूर है। कथनी और करनी के इस अंतर को छात्र बहुत अच्छी तरह से समझ रहे हैं। ऐसी स्थिति में अब वह विश्वास नहीं कर रहे हैं। वह अपनी हथेली में दही जमाने की स्थिति में आ गए हैं। वह जब एक बार अपनी मांग को लेकर उतरते हैं तो वह जिद के साथ उसे पूरी कराना चाहते हैं। उनके पास ऊर्जा बहुत है। इस ऊर्जा का उपयोग वह किसी भी स्तर तक जाकर कर रहे हैं। यह हमने जंतर मंतर और झारखंड में देखा। इसी तरह से मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार और कई राज्यों के स्कूली बच्चे जिस तरह से अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं उनके इस आंदोलन में उनकी वर्तमान ज़रूरतें और भविष्य के प्रति उनकी सजगता उन्हें आक्रामक बना रही है। दूसरी तरफ सरकार और भाजपा अभी भी इतिहास से जुड़े रहकर तथा उन्होंने जिस तरह से पिछले 12 वर्षों में सरकार चलाई है उसी को सत्य मानकर चल रहे हैं। इस कारण वह आज भी कांग्रेस और राहुल गांधी से मुकाबला करने की रणनीति में बार-बार इतिहास को सामने लेकर आ रहे हैं। वंदे मातरम और कांग्रेस ने कब क्या किया इससे आज के युवा को कोई लेना-देना नहीं है। वह अपनी समस्याओं का समाधान चाहता है। उसे जो बड़े-बड़े सपने दिखाए गए हैं वह उसे धरातल में देखना चाहता है। मिडिल और हाईस्कूल के बच्चों को यदि शिक्षा नहीं मिल पा रही है यह चिंता का विषय है। उच्च शिक्षा के विद्यार्थियों को यदि पढ़ाई के अवसर नहीं मिल पा रहे हैं, कॉलेज की फीस बहुत महंगी हो गई है, करोड़ों बेरोजगारों को नौकरी नहीं मिल पा रही है। ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट कर चुके युवा कहीं टैक्सी चला रहे हैं कहीं ऑनलाइन सामान की सप्लाई कर रहे हैं। वह किसी तरह से अपना जेब खर्च और मोबाइल इंटरनेट का खर्चा निकालने की जुगाड़ में रहते हैं। ऐसी स्थिति में वह सरकार के सपने पर विश्वास करने की स्थिति में नहीं है। ऐसी स्थिति में भाजपा को अपनी रणनीति बदलनी होगी। अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनने के बाद जिस तरह से वहां पर चंदा और चढावे की चोरी हुई है, उसके बाद धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति भी लगभग खत्म होने की स्थिति पर आ गई है। आम जनता अब इससे प्रभावित नहीं हो रही है। जो युवा धार्मिक ध्रुवीरण को लेकर अभी दूर था। यही युवा वर्ग अब खुलकर प्रतिक्रिया दे रहा है। मीडिया का भी बड़े पैमाने पर विरोध शुरू हो गया है। सोशल मीडिया में अब यह युवा वर्ग पूरी तरह से पारंगत हो चुका है। इसे बहकाया या भटकाया नहीं जा सकता है। आश्वासन और सपनों के सहारे इसे शांत भी नहीं किया जा सकता है। इस पीढ़ी का धैर्य समाप्त हो गया है। केंद्र सरकार और भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी को यह समझना होगा। इतिहास और पुरानी गलतियों की आड़ में अब छुपा नहीं जा सकता है। जंतर मंतर के आंदोलन में हुई बर्बरता को झारखंड के आंदोलन से दबाया भी नहीं जा सकता है। यह बात जितनी जल्दी समझ में आ जाए उतना अच्छा है। ईएमएस / 20 अगस्त 26