क्लॉड का दूसरे देश नहीं कर पाएंगे उपयोग वॉशिंगटन,(ईएमएस)। दुनिया में तकनीकी वर्चस्व की नई प्रतिस्पर्धा तेज हो गई है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) इस दौड़ का सबसे महत्वपूर्ण हथियार बनकर उभरा है। इसी बीच अमेरिका ने अपनी प्रमुख एआई कंपनी ऐंथ्रॉपिक को निर्देश दिया है कि वह अपने कुछ अत्याधुनिक एआई मॉडल विदेशी उपयोगकर्ताओं के लिए उपलब्ध न कराए। इस कदम को वैश्विक एआई प्रतिस्पर्धा में रणनीतिक बढ़त बनाए रखने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। ऐंथ्रॉपिक का एआई मॉडल ‘क्लॉड’ दुनिया भर में लोकप्रिय है, लेकिन चर्चा उसके अधिक उन्नत मॉडलों ‘मिथॉस’ और ‘फेबल 5’ को लेकर हो रही है। बताया जाता है कि ‘मिथॉस’ कंप्यूटर सिस्टम की कमजोरियों की पहचान करने में अत्यधिक सक्षम था और संवेदनशील नेटवर्क तक पहुंच बनाने की क्षमता रखता था। सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए बाद के मॉडलों में अतिरिक्त सुरक्षा प्रतिबंध जोड़े गए। एआई केवल एक तकनीक नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक शक्ति का आधार बन चुका है। यह तकनीक कंप्यूटरों को इंसानों की तरह सीखने और काम करने में सक्षम बना रही है। मेडिकल रिपोर्ट का विश्लेषण करने से लेकर सॉफ्टवेयर कोड लिखने, वीडियो तैयार करने और जटिल दस्तावेज बनाने तक, एआई कई क्षेत्रों में तेजी से अपनी भूमिका बढ़ा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जो देश एआई तकनीक में आगे होगा, वह भविष्य की वैश्विक शक्ति संरचना में भी मजबूत स्थिति हासिल करेगा। अमेरिका के इस फैसले का असर भारत सहित कई देशों पर पड़ सकता है। रिपोर्टों के अनुसार, कुछ उन्नत एआई मॉडलों तक विदेशी नागरिकों, कंपनियों और यहां तक कि अमेरिका में कार्यरत गैर-अमेरिकी कर्मचारियों की पहुंच भी सीमित की जा रही है। इससे यह संकेत मिलता है कि एआई को अब केवल व्यावसायिक तकनीक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय रणनीतिक संपत्ति के रूप में देखा जा रहा है। इस बीच एक और महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है, एआई मॉडल तैयार करने के लिए आवश्यक डेटा कहां से आ रहा है? सिस्टम को प्रशिक्षित करने के लिए बड़ी मात्रा में वास्तविक जीवन से जुड़े डेटा की जरूरत होती है। इसके लिए कई कंपनियां विकासशील देशों में लोगों की दैनिक गतिविधियों को रिकॉर्ड कर रही हैं। कारखानों में काम करने वाले कर्मचारियों से लेकर घरेलू कामकाज करने वाले लोगों तक, विभिन्न गतिविधियों के वीडियो और व्यवहार संबंधी डेटा का उपयोग रोबोट और एआई सिस्टम को प्रशिक्षित करने में किया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे डेटा का संग्रहण विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों में अपेक्षाकृत कम लागत पर संभव है। यही वजह है कि भारत जैसे देशों का डेटा वैश्विक एआई विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। हालांकि, इससे डेटा स्वामित्व और तकनीकी लाभ के बंटवारे को लेकर नए सवाल भी खड़े हो रहे हैं। एआई के क्षेत्र में अमेरिका और चीन फिलहाल सबसे आगे माने जाते हैं, जबकि भारत अभी अपनी क्षमताओं को तेजी से विकसित करने की दिशा में प्रयास कर रहा है। ऐसे समय में भारत के सामने चुनौती केवल नई तकनीक अपनाने की नहीं, बल्कि अपने डेटा संसाधनों, अनुसंधान क्षमता और एआई इकोसिस्टम को मजबूत बनाने की भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य की यह प्रतिस्पर्धा केवल व्यापार या तकनीकी उत्पादों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि डेटा, नवाचार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर नियंत्रण को लेकर वैश्विक शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करेगी। ऐसे में भारत के लिए आत्मनिर्भर एआई विकास और डेटा सुरक्षा रणनीति पर गंभीरता से काम करना समय की मांग बन गया है। वीरेंद्र/ईएमएस 17 जून 2026