लेख
19-Aug-2026
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- युवा शक्ति ही राष्ट्र के वर्तमान को दिशा और भविष्य को आकार दे सकती है भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा आबादी है। जिस देश में युवाओं की संख्या अधिक हो, वहां विकास की संभावनाएं भी व्यापक होती हैं। लेकिन युवा शक्ति तभी राष्ट्र की ताकत बनती है, जब उसमें विवेक, संस्कार, पुरुषार्थ, कर्तव्यबोध और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी की भावना हो। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने नागपुर में ‘हमारा तिरंगा हमारी शान’ कार्यक्रम में युवाओं को संबोधित करते हुए इसी जिम्मेदारी की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि आज के युवा तीस साल बाद बुजुर्ग होंगे, इसलिए उन्हें केवल अपने वर्तमान के बारे में नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की आवश्यकताओं के बारे में भी सोचना चाहिए। उनका यह विचार युवाओं को तत्काल लाभ से आगे बढ़कर दूरगामी दृष्टि अपनाने का संदेश देता है। भागवत ने युवाओं को देश का ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ बताते हुए कहा कि यदि युवा शक्ति को सही दिशा मिले तो देश को बहुत बड़ा लाभ हो सकता है, लेकिन यदि यह शक्ति दिशाहीन हो गई तो भविष्य में यही समाज के लिए बोझ बन सकती है। रोजगार का अर्थ केवल दफ्तर की नौकरी नहीं है। मेहनत और श्रम करने वाला प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्र की अर्थव्यवस्था में योगदान देता है और उसके श्रम का सम्मान होना चाहिए। युवाओं को अपनी प्रतिभा के अनुरूप रोजगार तलाशने के साथ-साथ नए अवसर पैदा करने और कारोबार तथा उद्यमिता की ओर भी बढ़ना चाहिए। भारत की परिस्थितियां दुनिया के दूसरे देशों से अलग हैं। भागवत ने इसी बात पर जोर देते हुए कहा कि भारत को अमेरिका, चीन, कनाडा या ऑस्ट्रेलिया की नकल करके अपनी विकास नीति तय नहीं करनी चाहिए। भारत की अपनी जनसंख्या, भौगोलिक परिस्थितियां, सामाजिक संरचना, संस्कृति और आवश्यकताएं हैं। इसलिए विकास का भारतीय मॉडल भी हमारी परिस्थितियों के अनुरूप होना चाहिए। भारत के लिए केवल अधिक उत्पादन और अधिक उपभोग ही प्रगति का अंतिम मानक नहीं हो सकता। हमारी सोच में मनुष्य, समाज, प्रकृति, संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों का हित भी शामिल होना चाहिए। युवा अवस्था जीवन का वह काल है जिसमें मनुष्य केवल अपने भविष्य का निर्माण नहीं करता, बल्कि समाज और राष्ट्र के भविष्य को भी प्रभावित करता है। बचपन सीखने का समय है, वृद्धावस्था अनुभव बांटने का समय है, लेकिन युवावस्था सर्जन की अवस्था है। इसी अवस्था में व्यक्ति अपने सपनों को कर्म में बदल सकता है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि गौतम बुद्ध, भगवान महावीर, भगवान कृष्ण, स्वामी विवेकानन्द, महर्षि दयानन्द सरस्वती और नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जैसे महान व्यक्तित्वों ने अपनी युवा ऊर्जा को रचनात्मक दिशा देकर समाज को नई राह दिखाई। गौतम बुद्ध के जीवन का एक प्रसंग युवाओं के लिए अत्यंत प्रेरक है। बुद्ध ने अपने शिष्य आनन्द से अशोक वृक्ष का एक पत्ता तोड़कर लाने को कहा। आनन्द ने पत्ता तोड़कर उन्हें दे दिया। इसके बाद बुद्ध ने कहा कि अब इस पत्ते को उसी डाल पर फिर से लगा दो। आनन्द ने कहा कि यह संभव नहीं है। तब बुद्ध ने समझाया कि तोड़ना आसान है, लेकिन जोड़ना कठिन है। यही शिक्षा आज राष्ट्र और समाज के लिए भी महत्वपूर्ण है। किसी परिवार को तोड़ना आसान है, समाज में विभाजन पैदा करना आसान है और अविश्वास की दीवार खड़ी करना भी आसान है, लेकिन टूटे संबंधों को जोड़ना अत्यंत कठिन होता है। आज आवश्यकता इसी जोड़ने वाली शक्ति को मजबूत करने की है। जाति, भाषा, क्षेत्र, संप्रदाय और राजनीतिक मतभेदों के बावजूद राष्ट्र की एकता सर्वोपरि रहनी चाहिए। भारत ने विभाजन का दर्द देखा है। इसलिए युवाओं को इतिहास से सीख लेकर ऐसी हर प्रवृत्ति से सावधान रहना चाहिए जो समाज में दूरी और अविश्वास बढ़ाती है। राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी सीमाओं से नहीं, बल्कि नागरिकों के आपसी विश्वास और सहयोग से बनती है। युवक शब्द को यदि भावार्थ की दृष्टि से देखें तो इसमें युग निर्माण, वचन और कर्तव्य का संदेश दिखाई देता है। युवक का पहला दायित्व है कि वह अपने समय को समझे और युग निर्माण में योगदान दे। उसकी वाणी में सत्य, संयम और सकारात्मकता होनी चाहिए। शब्दों में समाज को जोड़ने की क्षमता होनी चाहिए, तोड़ने की नहीं। महात्मा गांधी का जीवन भी यही सिखाता है कि केवल बोलने से परिवर्तन नहीं आता, उसके लिए कर्म आवश्यक है। युवा जितना अधिक बोलने के बजाय अपने कार्य से उदाहरण प्रस्तुत करेगा, उतना ही उसका प्रभाव समाज पर पड़ेगा। युवाओं का तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण गुण है कर्तव्यबोध। अधिकारों की चर्चा सहज होती है, लेकिन कर्तव्यों का पालन कठिन होता है। राष्ट्र केवल सरकार से नहीं बनता। राष्ट्र उसके करोड़ों नागरिकों के छोटे-छोटे कर्तव्यों से बनता है। विद्यार्थी ईमानदारी से अध्ययन करे, श्रमिक निष्ठा से श्रम करे, व्यापारी अपने व्यवहार में विश्वास बनाए रखे, कर्मचारी अपने दायित्व का निर्वहन करे और युवा समाज के कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशील बने, तो यही राष्ट्र निर्माण की वास्तविक प्रक्रिया है। वर्तमान समय में युवा पीढ़ी के सामने अनेक चुनौतियां भी हैं। तकनीक, सोशल मीडिया, त्वरित सफलता और उपभोग की संस्कृति ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन इसके साथ एकाग्रता, धैर्य और आत्मसंयम की परीक्षा भी बढ़ी है। युवाओं को यह समझना होगा कि जीवन का उद्देश्य केवल अधिक धन कमाना या अधिक सुविधाएं प्राप्त करना नहीं है। सफलता का वास्तविक अर्थ यह भी है कि व्यक्ति अपने ज्ञान, समय और क्षमता का उपयोग समाज के हित में करे। मोहन भागवत ने युवाओं को भविष्य की पीढ़ियों के बारे में सोचने की बात कहकर इसी व्यापक दृष्टि की ओर संकेत किया है। यदि आज का युवा केवल अपने सुख-सुविधाओं के बारे में सोचेगा तो आने वाली पीढ़ियों के सामने अनेक समस्याएं खड़ी हो सकती हैं। पर्यावरण संरक्षण, जल बचाना, प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग, शिक्षा की गुणवत्ता, रोजगार के अवसर और सामाजिक सद्भाव ऐसे विषय हैं जिन पर आज के युवाओं को गंभीरता से विचार करना होगा। आज लिए गए निर्णयों का प्रभाव आने वाले दशकों तक रहेगा। युवाओं को दिग्भ्रमित होने से भी बचना होगा। विरोध और असहमति लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन हिंसा, अराजकता और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। युवा ऊर्जा को रचनात्मक आंदोलन, नवाचार, शिक्षा, विज्ञान, कृषि, उद्यमिता, सामाजिक सेवा और राष्ट्र निर्माण की दिशा में लगाना अधिक उपयोगी है। समाज और सरकार की भी जिम्मेदारी है कि युवाओं की प्रतिभा को अवसर मिले, उनकी बात सुनी जाए और उन्हें निर्णय प्रक्रिया में सकारात्मक भागीदारी का स्थान दिया जाए। विनोबा भावे से जुड़ा एक प्रसंग भी युवाओं के लिए महत्वपूर्ण संदेश देता है। कागज के टुकड़ों से भारत का मानचित्र जोड़ने का प्रयास कई युवक कर रहे थे, लेकिन सफलता नहीं मिल रही थी। एक युवक ने कागज के पीछे बने मानव के चित्र को देखा और पहले मनुष्य के अंगों को जोड़ दिया। उसके साथ ही भारत का मानचित्र भी सही बन गया। संदेश स्पष्ट था कि राष्ट्र को जोड़ना है तो पहले मनुष्य को जोड़ना होगा। समाज में प्रेम, सम्मान और सद्भाव बढ़ेगा तो राष्ट्र स्वतः मजबूत होगा। आज के युवा को अपने भीतर पुरुषार्थ और स्वाभिमान जगाना होगा। धन कमाना बुरा नहीं है, सफलता प्राप्त करना भी गलत नहीं है, लेकिन सफलता का उपयोग केवल निजी सुख के लिए नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के हित के लिए भी होना चाहिए। युवा उद्यमी बने, वैज्ञानिक बने, शिक्षक बने, सैनिक बने, किसान बने, कलाकार बने या किसी भी क्षेत्र में जाए, लेकिन अपने कार्य में ईमानदारी और उत्कृष्टता को स्थान दे। राष्ट्र निर्माण किसी एक व्यक्ति या संस्था का कार्य नहीं है। यह प्रत्येक नागरिक की सामूहिक जिम्मेदारी है। युवा इस जिम्मेदारी का सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं। यदि उनमें चरित्र, अनुशासन, संवेदना, परिश्रम और राष्ट्रभक्ति का समन्वय हो जाए तो भारत की विकास यात्रा को नई गति मिल सकती है। आने वाला भारत कैसा होगा, इसका उत्तर आज के युवा के आचरण में छिपा है। युवाओं को यह संकल्प लेना होगा कि वे केवल अपने लिए नहीं, समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी जीवन जिएंगे। वे जोड़ने का काम करेंगे, तोड़ने का नहीं; सृजन करेंगे, विनाश नहीं; संवाद बढ़ाएंगे, वैमनस्य नहीं; कर्तव्य निभाएंगे, केवल अधिकार नहीं मांगेंगे। यही युवा जागृति राष्ट्र-प्रगति का आधार बनेगी। आज का युवा यदि संस्कार, ज्ञान और पुरुषार्थ के साथ आगे बढ़ता है तो वह केवल अपना भविष्य नहीं बनाएगा, बल्कि एक ऐसे भारत की नींव रखेगा जिसे आने वाली पीढ़ियां गर्व के साथ अपना देश कह सकेंगी। ( L 103जलवन्त टाउनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड़, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार-स्तम्भकार) ईएमएस / 19 अगस्त 26