बहुचर्चित महाभारत धारावाहिक में भीष्म की भूमिका निभाने वाले अभिनेता मुकेश खन्ना के एक बयान ने फिर से पुराने बहस को छेड़ है, जिसमें राष्ट्रवाद, राष्ट्रगान, वंदे मातरम्, रवींद्रनाथ टैगोर और अंग्रेजों की चापलूसी के पुराने आरोप बंद पड़े हैं। उन्होंने कहा है कि भारत का राष्ट्रगान जन गण मन नहीं, वंदे मातरम् होना चाहिए। तर्क यह कि जन गण मन अंग्रेजी सम्राट जॉर्ज पंचम के स्वागत में लिखा गया था और वंदे मातरम् ही असली राष्ट्रभक्ति का गीत है। राष्ट्रभक्ति के बाजार में ऐसे बयान खूब चलते हैं। एक बयान आता है, सोशल मीडिया दो खेमों में बंटता है और इतिहास बेचारा बीच में खड़ा होकर सोचता रहता है—भाई, मेरा भी कभी पढ़ लिया करो! वंदे मातरम् पर किसी भारतीय को गर्व क्यों न हो? वह स्वतंत्रता आंदोलन की आत्मा में बसा गीत रहा है। बंग-भंग आंदोलन से लेकर आजादी की लड़ाई तक उसने असंख्य लोगों में संघर्ष का उत्साह भरा। उसके लिए सम्मान कम नहीं किया जा सकता। लेकिन वंदे मातरम् का सम्मान करने के लिए जन गण मन को अंग्रेजों की चापलूसी बताना जरूरी क्यों हो गया? यहीं से इतिहास और राजनीतिक सुविधा के बीच फर्क समझना चाहिए। जन गण मन के सार्वजनिक गायन और जॉर्ज पंचम की भारत यात्रा का समय लगभग एक ही था। 1911 में कलकत्ता में कांग्रेस अधिवेशन के दौरान यह गीत गाया गया। इसी संयोग ने बाद में संदेह को जन्म दिया। कुछ समकालीन अखबारों ने इसे सम्राट के स्वागत से जोड़ दिया। लेकिन संयोग इतिहास का प्रमाण नहीं होता। रवींद्रनाथ टैगोर को बाद में इसी आरोप का जवाब देना पड़ा। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके गीत का ‘भाग्य विधाता’ कोई ब्रिटिश राजा नहीं था। भारत के भाग्य को दिशा देने वाली सत्ता ही उस संबोधन का आशय थी। बाद के वर्षों में भी टैगोर ने इस आरोप को अपने लिए अपमानजनक माना। अब जरा उस आदमी को देखिए, जिस पर ब्रिटिश सम्राट की चापलूसी का आरोप लगाया जा रहा है। यही रवींद्रनाथ टैगोर थे, जिन्होंने जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद ब्रिटिश सरकार की दी हुई ‘सर’ की उपाधि लौटा दी थी। 1919 में उन्होंने वायसराय को पत्र लिखकर कहा कि जब देश के लोगों के सम्मान और जीवन को कुचला जा रहा हो, तब सरकारी सम्मान धारण करना उनके लिए उचित नहीं। यानी जिस व्यक्ति ने अंग्रेजी सत्ता का सम्मान लौटा दिया, उसे उसी सत्ता के सम्राट की स्तुति में राष्ट्रगान लिखने वाला बताना इतिहास को अपनी सुविधा से पढ़ना है। लेकिन विवाद केवल इतना नहीं है। वंदे मातरम् और जन गण मन के बीच तुलना आज की खोज नहीं है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में भी इस पर बहस हुई। वंदे मातरम् का राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान इतना विराट था कि उसकी उपेक्षा संभव ही नहीं थी। लेकिन उसके आगे के अंतरों में देवी-रूपक होने के कारण कुछ मुस्लिम संगठनों ने आपत्ति जताई। दूसरी ओर जन गण मन की भाषा और भाव अधिक समावेशी माने गए। यानी आजादी की लड़ाई के नेताओं के सामने भी सवाल था कि ऐसा प्रतीक क्या हो, जिसे पूरा भारत अपना सके। यहां एक बात आज के राष्ट्रवादियों को विशेष रूप से समझनी चाहिए—राष्ट्र केवल बहुसंख्यक की भावना का नाम नहीं होता। राष्ट्र वह है, जिसमें असहमति रखने वाले के लिए भी जगह हो। इसीलिए संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को कोई आधा-अधूरा समझौता नहीं किया था। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि जन गण मन राष्ट्रगान होगा और वंदे मातरम् को स्वतंत्रता संग्राम में उसकी ऐतिहासिक भूमिका के कारण समान सम्मान दिया जाएगा। अर्थात संविधान सभा ने किसी गीत को हराया नहीं था। उसने दोनों की ऐतिहासिक भूमिकाओं को स्वीकार किया था। यह बात आज की राजनीति को शायद सबसे कम पसंद आती है—क्योंकि राजनीति को अक्सर एक को विजेता और दूसरे को पराजित घोषित करने में ज्यादा मजा आता है। लेकिन इतिहास इतना सरल नहीं होता। वंदे मातरम् हमारा राष्ट्रगीत है। जन गण मन हमारा राष्ट्रगान है। दोनों स्वतंत्रता संघर्ष की अलग-अलग स्मृतियों और भावनाओं को अपने भीतर रखते हैं। एक को ऊंचा करने के लिए दूसरे को गिराने की जरूरत नहीं। और फिर सवाल यह भी है कि राष्ट्रगान बदलने से राष्ट्रभक्ति बढ़ जाएगी क्या? क्या बेरोजगार युवा को रोजगार मिल जाएगा? क्या किसान की फसल का उचित मूल्य तय हो जाएगा? क्या स्कूलों में शिक्षक पहुंच जाएंगे? क्या सीमा पर खड़ा जवान बेहतर सुविधाओं से लैस हो जाएगा? क्या भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा? क्या संविधान में नागरिकों के अधिकार मजबूत हो जाएंगे? अगर इन सवालों का उत्तर ‘नहीं’ है, तो फिर राष्ट्रगान बदलने की राजनीति आखिर किस समस्या का समाधान है? राष्ट्रभक्ति की सबसे आसान किस्म वही है, जिसमें किसी गीत पर बहस की जाए और देश की असली समस्याओं पर चुप रहा जाए। राष्ट्रगान गाते समय हम खड़े होते हैं। लेकिन क्या राष्ट्र के सामने भी खड़े होते हैं? यही असली सवाल है। जन गण मन की पहली पंक्ति में ‘भारत भाग्य विधाता’ का उल्लेख है। टैगोर के अंग्रेजी अनुवाद में भी इसका अर्थ भारत के भाग्य को दिशा देने वाली सत्ता से जुड़ता है। भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव के दस्तावेजों में भी गीत का पाठ और अनुवाद उपलब्ध है। लेकिन राजनीति को इतिहास से ज्यादा सनसनी पसंद है। इसलिए सौ साल पुराने विवाद को फिर निकालकर कहा जाता है—देखिए, राष्ट्रगान तो अंग्रेजों के राजा के लिए लिखा गया था! इतिहास की किताबें बंद कर दीजिए और सिर्फ सोशल मीडिया खोल लीजिए, तो हर आदमी इतिहासकार दिखाई देगा। मगर इतिहास में फुटनोट भी होते हैं। और फुटनोट बताता है कि 1950 में संविधान सभा ने जन गण मन को राष्ट्रगान बनाने का फैसला किसी ब्रिटिश सरकार ने नहीं, स्वतंत्र भारत के प्रतिनिधियों ने किया था। उसी निर्णय में वंदे मातरम् को भी सम्मान दिया गया। यह भी कम दिलचस्प नहीं कि संविधान सभा में स्वयं ऐसे सदस्य थे, जिन्होंने वंदे मातरम् को राष्ट्रगान बनाने की वकालत की। यानी यह बहस दबाई नहीं गई थी। उस समय के प्रतिनिधि अपनी-अपनी राय रखते थे और अंततः एक ऐसा निर्णय हुआ, जिसमें दोनों परंपराओं को जगह मिली। यही लोकतंत्र है। लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं कि हमारी पसंद का गीत ही राष्ट्र का गीत हो। लोकतंत्र का अर्थ है कि राष्ट्र अपने प्रतीकों का चुनाव बहस, सहमति और ऐतिहासिक विवेक से करे। आज अगर किसी को वंदे मातरम् अधिक प्रिय लगता है, तो वह उसे पूरे सम्मान से गाए। लेकिन उसे यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वह जन गण मन को अपमानित करके ही अपनी राष्ट्रभक्ति साबित करे। और टैगोर को अंग्रेजों का कवि बताने से पहले यह भी याद रखना चाहिए कि गांधी उन्हें ‘गुरुदेव’ कहते थे। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में टैगोर और गांधी के बीच मतभेद थे, लेकिन दोनों के बीच सम्मान बना रहा। टैगोर भारतीय आधुनिकता, संस्कृति और विश्वमानव की ऐसी आवाज थे, जिसे किसी एक राजनीतिक खांचे में बंद करना मुश्किल है। सुभाष चंद्र बोस जैसे उग्र राष्ट्रवादी भी टैगोर के प्रति गहरा सम्मान रखते थे। यही भारत की सुंदरता थी—जहां गांधी और टैगोर बहस कर सकते थे, बोस और टैगोर संवाद कर सकते थे, लेकिन राष्ट्र की चिंता किसी एक की निजी संपत्ति नहीं थी। आज समस्या यह है कि हम राष्ट्र को भी पार्टी कार्यालय की तरह देखने लगे हैं। जिसको अपना पसंदीदा रंग दिखा, उसे राष्ट्रवादी घोषित कर दिया; जिसने दूसरा रंग देखा, उसे संदिग्ध बना दिया। राष्ट्र इससे बड़ा है। राष्ट्रगान भी इससे बड़ा है। वंदे मातरम् सुनकर किसी के भीतर स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति जागती है, तो वह स्मृति सम्मान की हकदार है। जन गण मन सुनकर किसी को भारत की विविधता, उसकी नदियों, पर्वतों, प्रदेशों और करोड़ों लोगों की सामूहिक चेतना दिखाई देती है, तो वह भावना भी उतनी ही सम्मान की हकदार है। राष्ट्रप्रेम को प्रतियोगिता क्यों बनाना? कौन ज्यादा राष्ट्रवादी—वह जो वंदे मातरम् गाता है या वह जो जन गण मन? यह सवाल ही गलत है। राष्ट्रभक्ति आवाज की ऊंचाई से नहीं, आचरण की गहराई से मापी जाती है। जो वंदे मातरम् गाकर भी पड़ोसी की नागरिकता पर शक करे, वह राष्ट्रभक्ति की परीक्षा में कितना पास है? जो जन गण मन गाते हुए संविधान के बराबरी के वादे को न माने, उसकी राष्ट्रभक्ति का क्या अर्थ है? जो राष्ट्रगान के समय खड़ा हो जाए, लेकिन कमजोर नागरिक के अधिकार के समय बैठा रहे, उससे राष्ट्र को क्या हासिल होगा? राष्ट्रगान बदलने की मांग करने से पहले हमें राष्ट्र की हालत बदलने की मांग करनी चाहिए। स्कूल में बच्चा भूखा न बैठे। किसान कर्ज में न डूबे। नौजवान नौकरी के लिए दर-दर न भटके। अस्पताल में गरीब इलाज के बिना न मरे। अदालत में न्याय सालों तक न अटके। स्त्री को सुरक्षा मिले। दलित और आदिवासी को सम्मान मिले। अल्पसंख्यक को बराबरी का भरोसा मिले। नागरिक को सरकार से सवाल पूछने का अधिकार रहे। यही राष्ट्रगान की असली धुन है। बाकी तो गीत हैं—बहुत सुंदर गीत। और भारत इतना बड़ा देश है कि उसमें एक से अधिक सुंदर गीतों के लिए जगह है। इसलिए वंदे मातरम् को सम्मान दीजिए, पूरा सम्मान दीजिए। लेकिन जन गण मन को अंग्रेजों की चापलूसी बताकर राष्ट्रभक्ति का प्रमाणपत्र मत बांटिए। क्योंकि राष्ट्रगान बदलने से इतिहास नहीं बदलता। इतिहास को बदलने के लिए पहले उसे गलत पढ़ना पड़ता है। और आजकल यही काम सबसे तेजी से हो रहा है। इतिहास फिर पूछ रहा है— मुझे पढ़ोगे, या अपने पक्ष में गढ़ोगे? (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) ईएमएस / 19 अगस्त 26