हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में राजनीति के अपराधीकरण को लेकर जो रिपोर्ट पेश की गई है उसके अनुसार 543 में से 251 सांसदों पर अपराधिक मामले दर्ज हैं। यह सभी मामले एमपी एमएलए कोर्ट में चल रहे हैं। इन मामलों की संख्या 4000 से ज्यादा है। लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभाओं में सांसद और विधायक धड़ाधड़ कानून पर कानून बना रहे हैं। अब तो बिना बहस के और बिना प्रक्रिया के सदन के अंदर बिल प्रस्तुत कर दिए जाते हैं और उन्हें हो-हल्ले के बीच में सत्ता पक्ष के सदस्यों द्वारा बहुमत के आधार पर पास कर लिया जाता है। आसंदी में विराजमान पीठासीन अधिकारी इन्हें पास भी कर देते हैं। लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा में पहले जब कोई कानून बनता था उसके पहले सभी सदस्यों को निर्धारित समय के अंदर उसकी कॉपी उपलब्ध करा दी जाती थी। कार्य मंतृणा की बैठक में उसके लिए समय निर्धारित किया जाता था। सत्ता पक्ष और विपक्ष के सांसद अथवा विधायक अपनी राय रखते थे। सदन यदि सहमत होता था तो संशोधन पर भी चर्चा होती थी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से यह सारी प्रक्रिया खत्म होती जा रही है। आसंदी पर सरकार का दबाव रहता है। बिल पास करने के लिए जिस तरह की राजनीतिक कूटनीति सदन के अंदर होती है, उसने जिन लोगों के लिए कानून बनाए जा रहे हैं उनकी सहभागिता एक तरह से खत्म हो गई है। जिसकी सरकार होती है वह मनमाने तरीके से कानून बना लेता है और वह कानून जबरिया लाद दिए जाते हैं। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है यदि कानून आम जनता स्वीकार नहीं करती है ऐसी स्थिति में कानून का पालन करना बड़ा कठिन हो जाता है। अदालतों में मुकदमों की संख्या बढ़ जाती है। आम जनता और सरकार दोनों मुकदमेबाजी में उलझ जाती है। सरकार और आम लोगों का पैसा खर्च होता है। वहीं न्यायपालिका भी समय पर न्याय नहीं कर पाती है। जिसके कारण संविधान और लोकतंत्र की जो मान्य परंपराएं थीं वह धीरे-धीरे खत्म होती जा रहे हैं। संसद और विधानसभा के सत्र बहुत छोटे होते जा रहे हैं। अब तो सांसद और विधायक जो अपने क्षेत्र से संबंधित बात सदन में रखते हैं उनमें भी चर्चा नहीं हो पा रही है। सांसद और विधायक केवल वेतन लेने वाले बन गए हैं। जब से दल-बदल कानून लागू हुआ, सचेतक और विहिप की व्यवस्था आई है उसके बाद सांसद और विधायकों की स्वतंत्रता भी खत्म हो गई है। वह ना तो अपनी बात कह सकते हैं और यदि वह कानून से सहमत नहीं हैं ऐसी स्थिति में उन्हें पार्टी विहिप के अनुसार मतदान करना पड़ता है। जिसके कारण सांसदों और विधायकों की स्वतंत्रता भी एक तरह से खत्म हो गई है। वह स्वतंत्र रूप से अपनी राय भी सदन के अंदर नहीं रख पा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था विशेष अदालतों के माध्यम से एक साल से कम समय में सांसद और विधायकों के मामलों का निपटारा किया जाएगा। सदन के अंदर ऐसे अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं होगी। लेकिन उनको प्रधानमंत्री बने 12 साल से अधिक हो चुके हैं, विशेष अदालतें भी काम कर रही हैं। इसके बाद भी अपराधियों की संख्या बढ़ती ही चली जा रही है। यह चिंता का विषय है। 28 में से 14 राज्यों के मुख्यमंत्रियों के खिलाफ भी न्यायालय में आपराधिक मामले वर्षों से लंबित पड़े हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट में अभी जो रिपोर्ट पेश हुई है उसमें उत्तर प्रदेश की जानकारी शामिल नहीं है, इसकी जानकारी आने के बाद यह संख्या और भी बढ़ सकती है। सरकार को सोचना होगा जो भी कानून बनते हैं कानून बनने और लागू होने के साथ ही बड़ी तेजी के साथ मुकदमों की संख्या क्यों बढ़ रही है? कहा जाता है 60 फ़ीसदी से ज्यादा मामलों में सरकार के खिलाफ मुकदमे दायर होते हैं। भारत में सरकार ही सबसे बड़ी मुकदमेबाज है। एक-एक पेशी में लाखों रुपए की फीस सरकार अधिवक्ताओं को देती है। जबकि उसके पास अधिवक्ताओं की एक बहुत बड़ी फौज होती है। उसके बाद भी सरकारों का खर्च वकीलों के रूप में बढ़ता ही चला जा रहा है। अब तो बड़े-बड़े वकील राजनीतिक आधार पर सुप्रीम कोर्ट छोड़कर हाईकोर्ट में पैरवी करने जा रहे हैं। इसने स्थिति को और भी विकट बना दिया है। केंद्र सरकार को इस मामले में गंभीरता से विचार करना होगा। वहीं सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट को भी जब संविधान ने यह अधिकार दिए हैं की जो भी कानून पास होते हैं वह मौलिक अधिकारों के दायरे में हों। जिस वर्ग के लिए कानून बनाए जा रहे हैं उनका व्यावहारिक स्वरूप हो कानून इस तरीके से बने कि उसमें सभी पक्ष संतुष्ट हों। जल्दबाजी में जो कानून बनाए और लागू किये जा रहे हैं उसके कारण न्यायपालिका में मुकदमों की बाढ़ आ गई है। अब तो संवैधानिक मामले भी सुप्रीम कोर्ट में 10 वर्ष से ज्यादा से लंबित पड़े हुए हैं। उनकी सुनवाई का नंबर नहीं आ पा रहा है। वर्तमान स्थिति को देखते हुए यही कहा जा सकता है। यदि यही हाल कुछ साल और रहा तो कानून का राज है यह कहना बंद करना पड़ेगा। कई मामलों में तो आदमी को मरने के बाद न्याय मिलता है। बोफोर्स का अंतिम फैसला लगभग 40 साल के बाद मिला है। इसमें सरकार के अरबो रुपए खर्च हुए। इसी तरह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मृत्यु के बाद अदालत ने उन्हें निर्दोष घोषित किया। मरने के बाद यदि इस तरह के फैसले मिले तो इन फैसलों का कोई औचित्य नहीं है। न्यायपालिका को इस दिशा में गंभीरता के साथ विचार करना होगा। तारीख पर तारीख या सरकार की अनुकूलता को देखते हुए फैसला देने की जो प्रवृत्ति न्यायपालिका की देखने को मिल रही है, उसने समस्या को और गंभीर बना दिया है। ईएमएस / 18 अगस्त 26