देश की आजादी के आठ दशक बाद अब भारतीय राजनीति और उनके प्रणेताओं के भी सोच-विचार ‘सठियातें’ नजर आने लगे है, इसका मेरी समझ में एकमात्र कारण हमारी जिन्दगी के हर पहलू पर राजनीति का हावी होना है और राजनीति भी वह जिसमें ‘स्वार्थ’ का प्रतिशत सर्वाधिक है और इसी कारण राष्ट्रीय त्यौहार, पर्व हो या नीजी जिन्दगी हर कहीं केवल और केवल राजनीति ही नजर आने लगी है, इसका ताजा उदाहरण विगत स्वतंत्रता दिवस पर नजर आया, जहां एक ओर लाल किले की प्राचीर पर शायद पहली बार राजनीतिक प्रचार की तस्वीर नजर आई वहीं देश के प्रमुख प्रतिपक्षी दल कांग्रेस के मुख्यालय में ध्वज वंदन व राष्ट्रीय गान के वक्त अजीब नजारा सामने आया, ये दोनों ऐसे परिदृष्य है, जिसमें हमारे कर्णधारों की राजनीतिक सोच और उनके कर्म की झलक दिखाई दी और राष्ट्रीय गान के गंभीर माहौल में भी राष्ट्रीय अपमान के दर्शन हुए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी ने जहां लाल किले की प्राचीर से अपने तैरहवें सम्बोधन में अपनी पार्टी के प्रचार को हवा दी, वहीं प्रमुख प्रतिपक्षी दल कांग्रेस के मुख्यालय में ध्वज वंदन के समय पार्टी की सबसे अहम् नैत्री सोनिया गांधी ने अजीब दृष्य प्रस्तुत किया, जिसमें उनकी राष्ट्र व राष्ट्रीय गीत के प्रति सम्मान का परिमाण नजर आया। सत्तारूढ़ और प्रतिपक्षी प्रमुख दल के वरिष्ठ नेता मौजूदा सेवा भावना और अपनी राजनीति को कितना महत्व देते है? यह भी स्पष्ट नजर आया। ....लेकिन इन परिदृष्यों ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि हमारे कर्णधार नेताओं की सोच कितनी और आज उसकी दिशा किस तरफ है? आज देश का प्रबुद्ध वर्ग इन दोनों परिदृष्यों से काफी विचलित और दुःखी है और इसी विवाद में इस वर्ग को देश के भविष्य पर चिंतन के लिए मजबूर कर दिया है। अब वह सब हो रहा है, जो आजादी के बाद के अब तक के आठ दशकों में कभी नही हुआ। कांग्रेस के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने अठारह बार, उनकी बेटी इंदिरा जी ने सत्रह बार, डाॅ. मनमोहन सिंह ने ग्यारह बार और स्वयं मोदी जी ने अब तक एक दर्जन बार लाल किले से ध्वज फहराया और देश को सम्बोधन किया, किंतु आज तक ये सम्बोधन कभी विवादित नही हुए? फिर यह आज क्यों हो रहा है, क्या अब राष्ट्रीय पर्व भी राजनीतियुक्त हो गए है? यह आज का सबसे अहम् चिंतनीय और चिंताजनक विषय है। इसलिए इस पर गंभीर चिंतन कर देश की नई दिशा की खोज जरूरी है। (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 18 अगस्त /2026