नशा केवल व्यक्ति के शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि धीरे-धीरे उसके परिवार, आर्थिक स्थिति, सामाजिक प्रतिष्ठा और जीवन-मूल्यों को भी कमजोर कर देता है। तंबाकू, गुटखा, पान मसाला और शराब जैसे व्यसन शुरुआत में भले ही छोटे लगें, लेकिन समय के साथ यही आदतें मनुष्य के जीवन पर भारी पड़ने लगती हैं। नशे की गिरफ्त में आया व्यक्ति अपनी मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा ऐसे पदार्थों पर खर्च करता है, जिनसे उसे स्वास्थ्य के अतिरिक्त कोई स्थायी लाभ नहीं मिलता। इसके विपरीत परिवार की जरूरतें अधूरी रह जाती हैं, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है और घर में तनाव का वातावरण बनने लगता है। यही कारण है कि नशे के खिलाफ सामाजिक जागरूकता के साथ सरकारों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत में तंबाकू का सेवन लंबे समय से गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बना हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार देश में करोड़ों लोग किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन करते हैं। इसमें सिगरेट और बीड़ी के साथ-साथ गुटखा, खैनी, जर्दा, पान मसाला और अन्य धुआं रहित तंबाकू उत्पाद शामिल हैं। इन पदार्थों में मौजूद निकोटिन व्यक्ति को धीरे-धीरे निर्भरता की ओर ले जाता है। शुरुआत अक्सर शौक या साथियों के दबाव में होती है, लेकिन बाद में यही आदत छोड़ना कठिन हो जाती है। तंबाकू के सेवन से मुंह, गले और फेफड़ों सहित शरीर के विभिन्न अंगों पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ सकते हैं। भारत में हर वर्ष बड़ी संख्या में लोगों की मौत तंबाकू से जुड़ी बीमारियों के कारण होती है। धुआं रहित तंबाकू के कारण मुंह के कैंसर का खतरा भी गंभीर चिंता का विषय है। नशे की समस्या केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध परिवार और समाज की आर्थिक स्थिति से भी है। दैनिक मजदूरी करने वाला व्यक्ति यदि अपनी दिनभर की कमाई का एक हिस्सा शराब या तंबाकू पर खर्च कर देता है तो उसका परिवार भोजन, शिक्षा और इलाज जैसी आवश्यकताओं के लिए संघर्ष करने को मजबूर हो सकता है। कई परिवारों में नशे के कारण घरेलू विवाद बढ़ते हैं। व्यक्ति की कार्यक्षमता घटती है और दुर्घटनाओं तथा सामाजिक अपराधों का खतरा भी बढ़ सकता है। इस दृष्टि से नशे की रोकथाम को केवल व्यक्तिगत पसंद का विषय मानना पर्याप्त नहीं है। यह समाज और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। शराब का व्यसन भी इसी समस्या का एक भयावह रूप है। शराब का सेवन करने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे अपने विवेक और आत्मनियंत्रण को कमजोर कर सकता है। अत्यधिक सेवन से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और व्यक्ति की पारिवारिक तथा सामाजिक जिम्मेदारियां प्रभावित होने लगती हैं। कई बार शराब की आदत व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को इस हद तक बिगाड़ देती है कि वर्षों की मेहनत से अर्जित धन नष्ट हो जाता है। इसीलिए शराब को लेकर समाज में केवल उपदेश नहीं, बल्कि जागरूकता, आत्मसंयम और परिवार के सहयोग की आवश्यकता है। नशे की समस्या में संगति की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। कई युवा केवल मित्रों के दबाव या उत्सुकता के कारण पहली बार किसी नशीले पदार्थ का सेवन करते हैं। उन्हें लगता है कि कभी-कभार सेवन करने से कोई नुकसान नहीं होगा, लेकिन यही शुरुआत आगे चलकर आदत में बदल सकती है। इसलिए परिवारों को बच्चों और युवाओं से संवाद बनाए रखना चाहिए। उन्हें नशे के नुकसान के बारे में डराने के बजाय तथ्य और समझ के साथ जागरूक करना चाहिए। युवाओं को खेल, शिक्षा, रचनात्मक गतिविधियों और सामाजिक कार्यों से जोड़ना भी नशे से दूर रखने का प्रभावी माध्यम हो सकता है। नशे के खिलाफ संघर्ष में समाज की भूमिका भी सरकार जितनी ही महत्वपूर्ण है। केवल कानून बना देने से समस्या समाप्त नहीं होगी। जिस समाज में नशे को प्रतिष्ठा, आधुनिकता या मनोरंजन का प्रतीक समझा जाता है, वहां कानून के साथ सामाजिक सोच में बदलाव आवश्यक है। सार्वजनिक स्थानों के आसपास नशीले पदार्थों की बिक्री पर निगरानी, अवैध बिक्री के खिलाफ कार्रवाई और युवाओं को नशे से बचाने के लिए लगातार अभियान चलाना जरूरी है। परिवार, विद्यालय, सामाजिक संगठन और धार्मिक संस्थाएं मिलकर इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसी व्यापक संदर्भ में कर्नाटक सरकार का हालिया फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कर्नाटक सरकार ने लोगों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए गुटखा, पान मसाला तथा तंबाकू या निकोटिन युक्त उत्पादों के निर्माण, भंडारण, वितरण और बिक्री पर एक वर्ष के लिए रोक लगाने का निर्णय किया है। राज्य के खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग ने 10 अगस्त को इस संबंध में अधिसूचना जारी की है। यह प्रतिबंध अधिसूचना जारी होने की तारीख से एक वर्ष तक प्रभावी रहेगा। हालांकि व्यक्तिगत सेवन को इस प्रतिबंध के दायरे में शामिल नहीं किया गया है। सरकार ने यह आदेश खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 तथा खाद्य सुरक्षा और मानक विनियम, 2011 के तहत प्राप्त अधिकारों का उपयोग करते हुए जारी किया है। कर्नाटक सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य राज्य में तंबाकू की लत पर अंकुश लगाना और स्वस्थ एवं नशामुक्त कर्नाटक की दिशा में आगे बढ़ना है। सरकार ने प्रतिबंध लागू करने के साथ निरीक्षण अभियान भी शुरू किए हैं। संबंधित विभागों की टीमें प्रतिबंधित तंबाकू और निकोटिन युक्त उत्पादों के निर्माण, बिक्री और वितरण पर नजर रखेंगी। उल्लंघन की स्थिति में उपलब्ध कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जा सकती है। सरकार ने नागरिकों से भी अपील की है कि यदि उन्हें ऐसे प्रतिबंधित उत्पादों की बिक्री या वितरण की जानकारी मिलती है तो संबंधित अधिकारियों को सूचित करें। यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि तंबाकू उत्पादों से जुड़े व्यापार से सरकारों को राजस्व प्राप्त होता है। ऐसे में स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए कठोर कदम उठाना आसान नहीं होता। कर्नाटक का निर्णय इस बात का संकेत है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य को आर्थिक हितों से ऊपर रखने की दिशा में प्रयास किए जा सकते हैं। हालांकि किसी भी प्रतिबंध की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसका जमीन पर कितना प्रभावी पालन होता है। प्रतिबंध के बाद सबसे बड़ी चुनौती इसकी प्रभावी निगरानी होगी। अतीत में यह देखा गया है कि जब किसी उत्पाद पर रोक लगती है तो कुछ लोग उसके विकल्प तलाशने लगते हैं। तंबाकू और दूसरे घटकों को अलग-अलग खरीदकर प्रतिबंधित मिश्रण तैयार करने जैसी कोशिशें भी सामने आ सकती हैं। इसलिए केवल तैयार उत्पादों की बिक्री रोकना पर्याप्त नहीं होगा। प्रशासन को अवैध निर्माण, भंडारण और वितरण की पूरी श्रृंखला पर नजर रखनी होगी। साथ ही लोगों को यह समझाना होगा कि किसी पदार्थ को अलग-अलग खरीदकर सेवन करना भी स्वास्थ्य के लिए उतना ही नुकसानदेह हो सकता है। दुनिया के कई देशों ने तंबाकू उत्पादों के खिलाफ कड़े कदम उठाए हैं। ऑस्ट्रेलिया, भूटान, सिंगापुर और श्रीलंका जैसे देशों में कुछ तंबाकू उत्पादों के निर्माण, बिक्री और आयात पर कड़े प्रतिबंध लागू किए गए हैं। इससे स्पष्ट है कि तंबाकू नियंत्रण आज केवल भारत की नहीं, बल्कि वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य की चुनौती है। कर्नाटक का फैसला निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण पहल है, लेकिन नशामुक्त समाज का निर्माण केवल सरकारी आदेश से संभव नहीं होगा। इसके लिए व्यक्ति को स्वयं संकल्प लेना होगा, परिवार को सहयोग देना होगा और समाज को नशे के खिलाफ वातावरण तैयार करना होगा। जो लोग पहले से नशे की गिरफ्त में हैं, उनके प्रति तिरस्कार के बजाय उन्हें इससे बाहर निकलने में सहायता देने की आवश्यकता है। नशा छोड़ने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को परिवार और समाज का समर्थन मिले तो उसके लिए नई शुरुआत करना आसान हो सकता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि नशे को फैशन या शौक के रूप में देखने की मानसिकता समाप्त हो। युवा अपनी ऊर्जा शिक्षा, खेल, रोजगार, कला और समाजसेवा में लगाएं। सरकारें स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दें और नशे के कारोबार पर प्रभावी नियंत्रण रखें। यदि शासन की कठोरता के साथ समाज की जागरूकता और व्यक्ति का आत्मसंयम जुड़ जाए तो नशे के खिलाफ लड़ाई को निर्णायक दिशा मिल सकती है। कर्नाटक का एक वर्ष का प्रतिबंध इसी बड़े उद्देश्य की ओर उठाया गया कदम है। इसकी वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी, जब यह आदेश केवल सरकारी कागजों तक सीमित न रहकर लोगों के जीवन में स्वस्थ बदलाव का माध्यम बने और नशे की आदत से दूर रहने की एक मजबूत सामाजिक चेतना पैदा करे। (L 103 जलवन्त टाउनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड़, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार ,साहित्यकार-स्तम्भकार) ईएमएस / 18 अगस्त 26