कहा जाता है, दिमाग से बड़े-बड़े काम भी आसानी से किए जा सकते हैं। मानव जीवन में दिमाग और ज्ञान ही एक ऐसी पूंजी होती है, जो हर काम को असंभव से संभव बना देती है। दुनिया में जितना भी विकास हुआ है, वह सब दिमाग और ज्ञान के बल पर ही हुआ है। पैसे से या ताकत से कोई भी काम संभव नहीं हुआ है, यह सत्य है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से 15 अगस्त 2026 को जो भाषण दिया है, उसमें उन्होंने दिमागी ज्ञान को नक्सलवाद से जोड़कर बातें कहीं हैं। उसको लेकर देश भर में बौद्धिक एवं सियासी घमासान छिड़ गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने दिमागी नक्सल, समाज में जो अराजकता फैलाने और युवाओं को भड़काने की कोशिश करते हैं, उसके बारे में इशारा किया है। पिछले कुछ दिनों से कॉकरोच जनता पार्टी और अन्य विपक्षी राजनीतिक दलों द्वारा छात्रों के आंदोलन जंतर मंतर और झारखंड में चलाए गए। इसमें बड़ी संख्या में जेन-जेड और जेन-अल्फा के छात्र-छात्राएं बड़ी संख्या में शामिल हुए। इन्होंने अपनी मांगों को लेकर सड़क पर आकर जो 200 से ज्यादा स्थानों पर प्रदर्शन किया है। निश्चित रूप से सरकारों, जिला एवं पुलिस प्रशासन के लिए यह एक चुनौती है। प्रधानमंत्री ने इन्हें दिमागी नक्सलवाद से जोड़कर एक बहुत बड़ा खतरा मोल ले लिया है। आजादी के 80वें वर्ष में हम आ चुके हैं। भारत में संविधान है, नागरिकों के मौलिक अधिकार हैं। राजनीतिक दल हैं, स्थानीय प्रशासन से लेकर राज्य सरकार और केंद्र सरकार का अस्तित्व बना हुआ है। जिला स्तर पर न्यायालय, हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट भी हैं। यह जो पीढ़ी आई है, उसने अपने अधिकारों और कर्तव्यों की नई सोच के साथ आगे बढ़ने का जो सपना संजोया है, उसे दिमागी नक्सलवाद कहना सही नहीं है। यह बात इसलिए भी कही जा सकती है, आज हम सूचना प्रौद्योगिकी, इंटरनेट एवं इलेक्ट्रॉनिक युग में जी रहे हैं। जहां पूरा विश्व एक हो चुका है। सारे विश्व के लोग एक दूसरे को देख रहे हैं। वह जो देखते और समझते हैं, वही सपने बुनते हैं। चुनाव जीतने के लिए स्थानीय प्रशासन से लेकर विधानसभा और लोकसभा के चुनाव में जो सपने पूरा करने का भरोसा जनप्रतिनिधि देते हैं। यदि वह पूरा नहीं करते हैं, ऐसी स्थिति में जनता के पास शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के अलावा कोई चारा नहीं रहता है। जब बड़ी संख्या में लोग अपनी बात कहने के लिए सामने आते हैं, ऐसी स्थिति में उनकी बातों पर सुनवाई होनी चाहिए। जो कठिनाइयां या गड़बड़ी उनके साथ हो रही हैं, उसको दूर करने की जिम्मेदारी जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों और न्यायपालिका की है। यदि वही नागरिकों से पल्ला झाड़ने लगेंगे, ऐसी स्थिति में जो छात्र अभी पढ़ना और जीना सीख रहे हैं। उन्हें वह सब नहीं मिलता है, जो उनके अधिकार का हैं। ऐसी स्थिति में विरोध प्रदर्शन करने के लिए वह किसी भी स्तर तक जा सकते हैं। केंद्र सरकार ने जंतर मंतर में हुए प्रदर्शन को जिस तरह से हैंडल किया। इस प्रदर्शन में राजनीतिक दल अपने आप को दूर रखे हुए थे। किसी भी राजनैतिक दल की सीधी सहभागिता नहीं थी। वही प्रदर्शन जब झारखंड में हो रहा है, वहां पर केंद्र सरकार, भाजपा ने राजनीति शुरू कर दी। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और भाजपा खुलकर आंदोलन में साथ आ गई है। भाजपा और मीडिया छात्रों की मांग के साथ जुड़ गई। जो मांग जंतर-मंतर में पूरी नहीं की गई, उस मांग के लिए झारखंड सरकार पर दबाव बनाकर मुख्यमंत्री का इस्तीफा मांगने की राजनीति के दोगलापन ने आज भारत को इस स्थिति पर लाकर खड़ा कर रहा है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है। यदि हमारे राजनेताओं, सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों ने जिस काम का जिम्मा लिया है, यदि वह सही तरीके से अपना काम नहीं करते हैं, उसमें गड़बड़ी होती है, भ्रष्टाचार होता है। सरकार ऐसे भ्रष्ट और नाकारा लोगों पर कोई कार्रवाई नहीं करती है। ऐसी स्थिति में 12 से 16 साल के छात्र अपनी स्कूल से संबंधित शिकायतों, पहुंच मार्ग, बस किराए इत्यादि को लेकर जब अपनी मांग को लेकर सड़कों पर आते हैं, तब इन्हें कैसे नक्सलवाद कहा जा सकता है। पेट की आग और जीवन की जरूरतें जब पूरी नहीं होती हैं, तब जंगल का कानून लागू होता है। इस बात को हमें ध्यान में रखना चाहिए। कोई भी व्यक्ति जब भोजन अथवा अपनी रोजमर्रा की जरूरत के लिए संघर्ष करता है, इस संघर्ष में वह क्या पाएगा और क्या खोएगा, इसका उसे एहसास नहीं होता है। जंगल के कानून में शिकार और शिकारी के बीच यही एक संबंध है। इसी तरह का संबंध आम जनता और सरकारों के बीच है। सरकार के विभिन्न पदों पर बैठे हुए लोगों को यह समझना होगा। सामाजिक जीवन में शिक्षा, रोजगार, भोजन, स्वास्थ्य, बिजली, पानी जब सभी वर्गों को समान रूप से नहीं मिलते हैं तभी जाकर नक्सलवाद, दिमागी नक्सलवाद, शहरी नक्सलवाद, आंदोलनकारी पैदा होते हैं। यह अपनी जरूरतों के लिए लड़ रहे होते हैं। सभ्य समाज की लोकतांत्रिक सरकारों में उनकी जरूरतों की अनदेखी होती है। यही सबसे बड़ा विद्रोह का कारण बनता है। भारतीय न्यायपालिका की वर्तमान में क्या स्थिति है, यह सभी ने देख ली है। जेन-जेड एवं जेन-अल्फा की समस्या को नहीं समझा गया तो जल्द ही यह बड़े विस्फोट के रूप में सामने आएगा। जो अभी झारखंड में हो रहा है, एक महीने बाद वही सब जंतर-मंतर में भी होता हुआ दिखेगा। राजनीति में जिस तरह से राजनेता रंग बदलकर लोगों को वरगला रहे हैं। सही मायने में यही सबसे बड़ी समस्या है। जिस दिन राजनीतिक दल और सरकारें, सत्य को स्वीकार करना शुरू कर देंगी, उसी दिन यह समस्या निपटते देर नहीं लगेगी। कथनी और करनी का फर्क ही नक्सलवाद अथवा आंदोलन की समस्या की मूल जड़ है। ईएमएस / 17 अगस्त 26