लेख
17-Aug-2026
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जीवन फूलों की सेज नहीं है। यहाँ पल-पल संघर्ष है, परेशानियाँ हैं, कष्ट हैं और दुःख भी हैं। एक समस्या हल होती है तो दूसरी सामने खड़ी हो जाती है। लेकिन समस्याओं को देखकर हमें घबराना नहीं चाहिए। जीवन में सुख है तो दुःख भी है, छाया है तो धूप भी है। वास्तव में, यही जीवन का स्वाभाविक चक्र है। सच तो यह है कि मनुष्य के जीवन में समस्याएँ आती-जाती रहती हैं; आवश्यकता इस बात की है कि हम उनका सामना किस दृष्टि और मानसिकता से करते हैं। अक्सर समस्याओं के पीछे हमारी अपनी सोच और ‘मैं’ की भावना भी बड़ी भूमिका निभाती है। हम अपने पद, धन, ज्ञान, सफलता, सम्मान या विचारों को अपनी पहचान मान लेते हैं और चाहते हैं कि दूसरे भी हमें उसी रूप में स्वीकार करें। जब कोई हमारी बात नहीं मानता, हमारी आलोचना करता है या हमें अपेक्षित महत्व नहीं देता, तो हमें दुःख, क्रोध या अपमान का अनुभव होता है। यही अहंकार का एक रूप है। अहंकार का अर्थ केवल घमंड करना नहीं है, बल्कि अपने बारे में बनाई गई धारणाओं को ही अपना वास्तविक स्वरूप मान लेना भी है। इसलिए हमें अहंकार से लड़ने के बजाय अपने विचारों और भावनाओं को समझना चाहिए। जब क्रोध आए, अपमान महसूस हो या किसी से स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने की इच्छा हो, तब थोड़ी देर रुककर स्वयं से पूछना चाहिए कि हमारे भीतर ऐसा क्यों हो रहा है। धीरे-धीरे हमें समझ आने लगता है कि ये भाव स्थायी नहीं हैं। जब हम हर बात में स्वयं को सही साबित करने, दूसरों से तुलना करने और अपनी श्रेष्ठता दिखाने की इच्छा से मुक्त होने लगते हैं, तब मन में शांति आने लगती है। हम जीवन और लोगों को अधिक सहजता तथा वास्तविकता के साथ देख पाते हैं।अहंकार के संबंध में कहा जाता है-अहंकारः पतनस्य मूलं, विनयः प्रगतेः पन्थाः। यत्र विनयः तत्र ज्ञानं, यत्र ज्ञानं तत्र शान्तिः॥ इसका भावार्थ है कि अहंकार पतन का मूल है और विनय उन्नति का मार्ग है। जहाँ विनय है, वहाँ ज्ञान है और जहाँ ज्ञान है, वहाँ शांति है। वास्तव में विनय जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण गुण है। विनय का अर्थ केवल नम्र होकर बोलना नहीं, बल्कि दूसरों का सम्मान करना, अपनी सीमाओं को स्वीकार करना और सीखने के लिए सदैव तैयार रहना है। विनम्र व्यक्ति अपनी सफलता पर घमंड नहीं करता और अपनी गलतियों से सीखने में संकोच नहीं करता। इसी कारण वह लोगों के बीच सम्मान और विश्वास प्राप्त करता है। ज्ञान होने पर भी यदि विनय नहीं है, तो ज्ञान अहंकार में बदल सकता है; लेकिन विनय के साथ ज्ञान व्यक्ति के व्यक्तित्व को ऊँचा बनाता है। विनय हमें क्रोध, अहंकार और अनावश्यक विवादों से बचाता है तथा रिश्तों को मजबूत बनाता है। पद, धन और सफलता मनुष्य को बड़ा नहीं बनाते, बल्कि उसका विनय और व्यवहार उसे महान बनाते हैं। इसलिए जीवन में जितना ज्ञान और सफलता आवश्यक है, उतनी ही विनम्रता भी आवश्यक है। समस्याएँ जीवन का हिस्सा हैं और उनसे बचना संभव नहीं, लेकिन अपनी प्रतिक्रिया को नियंत्रित करना हमारे हाथ में है। जब हम परिस्थितियों को बदलने के बजाय अपने भीतर के ‘मैं’ को समझना शुरू करते हैं, तब कठिन परिस्थितियाँ भी हमें तोड़ने के बजाय मजबूत बनाने लगती हैं। अंततः जीवन की सच्ची शांति बाहर की परिस्थितियों को बदलने से नहीं, बल्कि अपने भीतर के ‘मैं’ को समझने, अहंकार को नियंत्रित करने और विनय को अपनाने से मिलती है। यही संतुलित, सार्थक और शांत जीवन का मार्ग है। (सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार।) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) ईएमएस / 17 अगस्त 26