लेख
17-Aug-2026
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मेहनत से निखरता है व्यक्तित्व, व्यसन से मिटती है जीवन की शक्ति मनुष्य के जीवन की वास्तविक पहचान उसके पुरुषार्थ से होती है। परिस्थितियां कैसी भी हों, यदि व्यक्ति के भीतर परिश्रम करने, संघर्ष करने और आगे बढ़ने का संकल्प है तो कठिन से कठिन रास्ता भी आसान हो जाता है। इसके विपरीत जब मनुष्य पुरुषार्थ छोड़कर आलस्य, निराशा और व्यसनों का सहारा लेने लगता है, तब उसकी क्षमताएं धीरे-धीरे क्षीण होने लगती हैं। इसलिए जीवन को सार्थक और सफल बनाने के लिए पुरुषार्थ जगाना तथा दुर्व्यसनों से दूर रहना अत्यंत आवश्यक है। दक्षिण अफ्रीका के एक प्रसंग से इसकी प्रेरणा मिलती है। वहां अंग्रेजों के अत्याचार के विरुद्ध आंदोलन चल रहा था। एक सत्याग्रही को जोहन्सबर्ग की जेल में बंद कर दिया गया। जेल में सभी कैदियों से काम कराया जाता था। अधिकांश कैदी किसी तरह अपना काम पूरा करते, लेकिन एक कैदी निर्धारित समय से पहले ही अपना कार्य पूरा कर लेता और बचे हुए समय में ज्ञानवर्धक पुस्तकें पढ़ता रहता। एक दिन जेल का निरीक्षण करने आए अंग्रेज गवर्नर ने उससे पूछा कि उसे कोई परेशानी तो नहीं है। उस कैदी ने कहा कि यहां पूरा काम नहीं मिलता। गवर्नर को आश्चर्य हुआ। उसने पूछा कि जब दूसरे कैदी काम से बचने का प्रयास करते हैं तो वह अधिक काम क्यों करना चाहता है। कैदी ने उत्तर दिया कि वह इसलिए अधिक काम करता है ताकि उसकी मेहनत करने की क्षमता नष्ट न हो जाए। यह साधारण-सा कैदी आगे चलकर भारत के स्वतंत्रता संग्राम का महानायक बना। वह थे महात्मा गांधी। उनके जीवन का यह प्रसंग बताता है कि परिस्थितियां व्यक्ति को महान नहीं बनातीं, बल्कि परिस्थितियों के बीच किया गया पुरुषार्थ व्यक्ति को महान बनाता है। भारत की संस्कृति ने सदैव पुरुषार्थ को जीवन का आधार माना है। इस धरती पर अनेक महापुरुष हुए, जिन्होंने समाज को अहिंसा, सत्य, सर्वोदय और अनेकांत जैसे महान सिद्धांत दिए। आचार्य समन्तभद्र ने सदियों पहले सर्वोदय की कल्पना करते हुए सबके कल्याण और अभ्युदय की भावना प्रस्तुत की। भगवान महावीर ने भी समाज में समानता, स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता का संदेश दिया। उन्होंने जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव को चुनौती देते हुए धर्म का द्वार सभी के लिए खोलने की प्रेरणा दी। उनका संदेश स्पष्ट था कि मनुष्य अपने कर्म और पुरुषार्थ से अपने जीवन का निर्माण कर सकता है। पुरुषार्थ करने वाले व्यक्ति के लिए सफलता की राह खुलती जाती है। जीवन में अवसर सभी को मिलते हैं, लेकिन उनका लाभ वही उठा पाता है जो समय पर प्रयास करता है। एक छोटी-सी घटना इस बात को बहुत सरलता से समझाती है। सड़क पर बैलगाड़ी जा रही थी और कुछ बच्चे उसके साथ चल रहे थे। गाड़ी देखकर कुछ बच्चे दौड़कर उसमें चढ़ गए, जबकि कुछ पीछे रह गए। गाड़ीवान से पूछा गया कि कुछ बच्चे पीछे क्यों रह गए। उसने सहज उत्तर दिया कि जिनमें हिम्मत और पुरुषार्थ था, वे गाड़ी में चढ़ गए। यह प्रसंग जीवन का भी सत्य है। अवसर सामने आने पर जो व्यक्ति प्रयास करता है, वही आगे बढ़ता है। आज पुरुषार्थ की सबसे बड़ी आवश्यकता व्यसनों से बचने के लिए है। हमारे आसपास अनेक प्रकार के आकर्षण और बुरी आदतें मौजूद हैं। नशा और अन्य दुर्व्यसन व्यक्ति की सोच, समय, धन और कार्यक्षमता को प्रभावित करते हैं। व्यसन केवल व्यक्ति को ही नुकसान नहीं पहुंचाते, बल्कि परिवार और समाज को भी कमजोर करते हैं। एक व्यक्ति की बुरी आदत धीरे-धीरे पूरे परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को प्रभावित कर सकती है। इसलिए व्यसन से दूर रहना भी अपने आप में एक बड़ा पुरुषार्थ है। समाज में व्यसन-मुक्ति के लिए अनेक अभियान चलाए जाते हैं। सरकार और सामाजिक संस्थाएं लोगों को नशे से दूर रहने के लिए जागरूक करती हैं। सभाएं होती हैं, जनजागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और लोगों को स्वस्थ जीवन के लिए प्रेरित किया जाता है। लेकिन केवल अभियान चलाने से समस्या समाप्त नहीं होगी। इसके लिए परिवार, समाज और प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। जिस व्यक्ति में स्वयं अनुशासन नहीं है, वह दूसरों को अनुशासन का संदेश प्रभावी ढंग से नहीं दे सकता। इसलिए व्यसन-मुक्त समाज की शुरुआत स्वयं से करनी होगी। व्यसन व्यक्ति की बुद्धि और विवेक को कमजोर कर देते हैं। एक प्रसिद्ध प्रसंग में एक व्यक्ति को यह अवसर दिया गया कि वह चार विकल्पों में से किसी एक को चुने। उसने आसान समझकर शराब का रास्ता चुना, लेकिन नशे के प्रभाव में उसके विवेक पर नियंत्रण नहीं रहा और एक गलत निर्णय दूसरे गलत निर्णय को जन्म देता चला गया। इस प्रसंग का संदेश यही है कि व्यसन अक्सर अकेला नहीं आता। एक बुरी आदत दूसरी बुरी आदत का रास्ता खोल सकती है और व्यक्ति धीरे-धीरे अपने विवेक तथा आत्मनियंत्रण को खो सकता है। इसीलिए व्यसन को केवल एक व्यक्तिगत आदत मानना पर्याप्त नहीं है। यह परिवार, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक वातावरण से जुड़ी समस्या है। जिस धन का उपयोग परिवार की शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य के निर्माण में होना चाहिए, वह व्यसनों में नष्ट हो सकता है। जिस समय का उपयोग ज्ञान, रोजगार और आत्मविकास में होना चाहिए, वह व्यर्थ चला जाता है। सबसे बड़ी क्षति यह होती है कि व्यक्ति के भीतर आगे बढ़ने की इच्छा और कार्यक्षमता कमजोर होने लगती है। जैन दर्शन मनुष्य को अपने जीवन का निर्माता मानता है। भगवान महावीर ने आत्मबल, संयम और पुरुषार्थ का मार्ग दिखाया। उनका संदेश व्यक्ति को अंधानुकरण से निकालकर जागरूकता और आत्मप्रयास की ओर ले जाता है। जीवन में कुछ प्राप्त करना है तो स्वयं प्रयास करना होगा। केवल इच्छा करने से सफलता नहीं मिलती। जिस प्रकार दीपावली पर लक्ष्मी का पूजन करने के साथ व्यक्ति को अपने कर्म और परिश्रम से धन अर्जित करना पड़ता है, उसी प्रकार जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषार्थ आवश्यक है। पुरुषार्थ केवल धन कमाने तक सीमित नहीं है। ज्ञान प्राप्त करना भी पुरुषार्थ है, चरित्र का निर्माण करना भी पुरुषार्थ है, परिवार के प्रति जिम्मेदारी निभाना भी पुरुषार्थ है और समाज के हित में काम करना भी पुरुषार्थ है। अपने भीतर की बुरी आदतों पर विजय पाना सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। जब व्यक्ति अपने श्रम से समृद्ध होता है तो वह उस समृद्धि का उपयोग समाज और जरूरतमंदों की सेवा में भी कर सकता है। भारत में बने अनेक भव्य धार्मिक और सांस्कृतिक स्मारक समाज के सामूहिक पुरुषार्थ और दान की परंपरा के प्रतीक हैं। अजन्ता-एलोरा की गुफाएं और गोमटेश्वर की विशाल प्रतिमा मानव प्रतिभा, श्रम और संकल्प की अद्भुत मिसाल हैं। ऐसी रचनाएं केवल धन से नहीं बनतीं। इनके पीछे वर्षों का श्रम, कुशलता, संगठन, धैर्य और दृढ़ संकल्प होता है। यही पुरुषार्थ मनुष्य को साधारण से असाधारण बनाता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि युवा पीढ़ी को व्यसनों के आकर्षण से बचाकर श्रम, शिक्षा, खेल, ज्ञान और रचनात्मक गतिविधियों की ओर प्रेरित किया जाए। परिवार बच्चों के साथ संवाद करे, समाज सकारात्मक वातावरण बनाए और प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में आत्मअनुशासन को स्थान दे। व्यसन से बचने वाला व्यक्ति केवल अपने जीवन को नहीं बचाता, बल्कि अपने परिवार के भविष्य को भी सुरक्षित करता है। मनुष्य के भीतर अपार शक्ति है। आवश्यकता केवल उसे पहचानने की है। परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, पुरुषार्थ का दीपक जलता रहे तो अंधकार अधिक समय तक टिक नहीं सकता। व्यसन मनुष्य की शक्ति को भीतर से कमजोर करते हैं, जबकि पुरुषार्थ उसे आत्मविश्वास, सम्मान और सफलता की ओर ले जाता है। इसलिए जीवन में एक संकल्प होना चाहिए कि बुरी आदतों से दूरी बनाएंगे, अपनी क्षमताओं को पहचानेंगे और निरंतर आगे बढ़ने का प्रयास करेंगे। यही पुरुषार्थ जीवन को सार्थक बनाएगा और व्यक्ति के साथ-साथ परिवार, समाज तथा राष्ट्र को भी मजबूत करेगा। ईएमएस/17/08/2026