लेख
17-Aug-2026
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एक पुरानी लोकोक्ति है मन के हारे हार है मन के जीते जीत। यह आज और अधिक प्रासंगिक बन जाता है जब दुनिया की युवा पीढ़ी जीवन में आने वाली जरा सी असहज परिस्थिति में मुकाबला नहीं कर पलायन का रास्ता अपना रही है। आपको बता दें गाजियाबाद की एक लब्धप्रतिष्ठ मनोचिकित्सक जो दूसरे रोगियों के मन की गुत्थियां सुलझा कर जीवन जीने की प्रेरणा देती थी उसके पास रोजाना की डिप्रेशन और दूसरी मानसिक बीमारी के रोगियों की कतार लगती थी वह हजारों अवसाद ग्रस्त रोगियों का उपचार कर चुकी थी वह रोगियों को सकारात्मक सोच के साथ जीने की सलाह देते देते परिस्थितियों के ऐसे दुष्चक्र में फंसी कि स्वयं डिप्रेशन का शिकार बन गयी। यहां बता दें कि उनके पिता भी क्षेत्र के बहुत अनुभवी मनोचिकित्सक है उन्होंने भी अपनी डाॅक्टर बेटी को अवसाद से बाहर लाने की हर कोशिश की लेकिन नाकाम हो गए। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के राजनगर एक्सटेंशन स्थित ऑफिसर सिटी-2 सोसाइटी में बीते 2 अगस्त को एक दर्दनाक घटना सामने आई. सोसाइटी की सातवीं मंजिल स्थित फ्लैट से कूदकर महिला मनोचिकित्सक डॉ. हेमिका अग्रवाल ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली. घटना में उनकी मौके पर ही मौत हो गई. मृतका के पिता गाजियाबाद के प्रसिद्ध मनोचिकित्सा डॉ. आर. चंद्रा ने बताया कि करीब डेढ़ वर्ष पहले डॉ. हेमिका का अपने पति से तलाक हो गया था. उनके अनुसार, तलाक के बाद वह मानसिक तनाव और अवसाद (डिप्रेशन) से जूझ रही थीं. घटना की सूचना मिलते ही स्थानीय पुलिस मौके पर पहुंची और शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और मामले की जांच शुरू कर दी है. पुलिस अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल सभी पहलुओं से जांच की जा रही है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट, घटनास्थल से मिले साक्ष्यों और परिजनों के बयानों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी. जिस पेशे का मकसद लोगों को मानसिक तनाव, अवसाद और भावनात्मक संकट से बाहर निकालना होता है, उसी पेशे से जुड़ी एक महिला मनोचिकित्सक की संदिग्ध मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. इस घटना ने मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस छेड़ दी है कि मानसिक बीमारियां किसी भी व्यक्ति को प्रभावित कर सकती हैं, चाहे वह स्वयं इस विषय का विशेषज्ञ ही क्यों न हो. इस घटना से एक सबक और मिलता है कि जीवन के लिए सिर्फ उच्च शिक्षा डिग्रियां बढ़िया कमाई सम्मानित प्रोफेशन उच्च रहन सहन कोठी बंगला गाड़ी बैंक बेलेंस ही पर्याप्त नहीं है बल्कि कुछ और भी है जो इन सब उपलब्धियों से भी कहीं ज्यादा जरूरी है वह है मनोबल। मनोबल ही एक इंसान की जीवन में आने वाले संकटों परिक्षाओं में जूझने की क्षमता देता है उसके भीतर सामर्थ्य आत्मविश्वास आत्मसंतोष पैदा करता है। आपको बता दें दुनिया भर में करोड़ों लोग गंभीर मानसिक तनाव, पारिवारिक कलह, वित्तीय संकट, करियर या पढ़ाई के दबाव और अकेलेपन के कारण आत्महत्या कर रहे हैं। दरअसल इसका मुख्य कारण डिप्रेशन (अवसाद) और एंग्जाइटी जैसी समस्याएं समय पर पहचान या इलाज न मिलने के कारण गंभीर हो जाती हैं। आपसी मनमुटाव, घरेलू कलह, रिश्तों में टूटन या तलाक का दबाव। कर्ज का बोझ, बेरोजगारी, नौकरी छूटना या व्यापार में भारी नुकसान। परीक्षा में असफलता, अच्छे नंबर लाने की जिद और माता-पिता या समाज की उच्च उम्मीदें। समाज से कटाव, अपनों से संवाद की कमी और सोशल मीडिया पर दूसरों से अपनी झूठी तुलना कर हीन भावना आना ये सभी इसके जिम्मेदार कारणों में माने जाते हैं । विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, पूरी दुनिया में हर साल लगभग 7,20,000 से ज्यादा लोग अपनी जान गंवाते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में एक साल में लगभग 1.71 लाख से अधिक लोगों की मौत आत्महत्या से होती है, जिसमें युवाओं और विवाहित पुरुषों की संख्या एक बड़ा हिस्सा है।बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं ने चिंता बढ़ा दी है. इसकी वजह यह है कि ऐसी एक आत्महत्या सिर्फ एक व्यक्ति नहीं बल्कि पूरे परिवार की बर्बादी होती है. रिपोर्ट में कहा गया है कि आत्महत्या करने वाले शादीशुदा पुरुषों की तादाद लगातार बढ़ रही है. वर्ष 2024 के दौरान आत्महत्या करने वालों में 67.5 फीसदी लोग विवाहित थे. पारिवारिक कारणों से विवाहित पुरुषों के आत्महत्या की बात जब सामने आती है तो कई बार उनकी पत्नियों की ओर उंगली उठती है. बीते सालों में दो तीन ऐसे मामले हुए जिसमें पत्नियों को जिम्मेदार बताया गया और ऐसे मामलों ने मीडिया की खूब सुर्खियां बटोरीं. लेकिन गाजियाबाद की मनोचिकित्सक का मामला ठीक विपरीत है इसके मूल में भी अवसाद की बीमारी है। आपको बंबईया हिन्दी फिल्म खामोशी की नायिका तो याद होगी जो मानसिक रोगियों का इलाज करते करते स्वयं मानसिक रोगी बन जाती है डाॅक्टर हेमिका का मामला भी खामोशी की नायिका से बहुत कुछ मिलता जुलता है। आपको बता दें कि भारत और पूरी दुनिया में डिप्रेशन एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या बनता जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया भर में करोड़ों लोग इस समस्या से पीड़ित हैं और यह युवाओं व किशोरों में तेजी से बढ़ रहा है।डिप्रेशन बढ़ने के प्रमुख कारण तनावपूर्ण जीवनशैली है काम का भारी दबाव, नौकरी की चिंता और प्रतिस्पर्धा। मोबाइल या टीवी लेपटाप स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताना और वास्तविक मेल-जोल की कमी। गलत आदतें और शारीरिक गतिविधि न होना। परिवार और समाज से कटाव महसूस करना।हर समय उदास या बुझा-बुझा रहना।किसी भी काम में मन न लगना।बहुत कम या बहुत ज्यादा नींद आना।लगातार थकान और कमजोरी महसूस होना। अपने मन की बात दोस्तों या परिवार के साथ साझा करें। नियमित रूप से प्राणायाम और ध्यान करने से मानसिक शांति मिलती है। यदि लक्षण दो हफ्ते से ज्यादा रहें, तो किसी मनोचिकित्सक या काउंसलर से तुरंत मदद लें। रिपोर्ट के अनुसार भारत में करीब 4.57 करोड़ लोग डिप्रेशन से जूझ रहे हैं और हर वक्त लगभग 2.3 करोड़ लोगों को किसी की मदद की जरूरत होती है। अगर आप उदास, परेशान या अकेला महसूस कर रहे हैं तो घबराएं नहीं अपने आसपास सामाजिक गतिविधियों पूजा पाठ या किसी ऐसे काम में व्यस्त होने का प्रयास करें ताकि आप व्यस्त हो जाए साथ ही किसी अच्छे चिकित्सक की देख रेख में उपचार लें। मजबूत इरादे वाले लोग कठिन समय में भी रास्ता ढूंढ लेते हैं। मन में डर और असफलता का विचार आते ही हमारी आधी ताकत खत्म हो जाती है। खुद पर भरोसा रखने से बड़ी से बड़ी बाधा को पार किया जा सकता है। असफलता जीवन का अंत नहीं है, बल्कि सीखने का एक अवसर है।मैदान में हारने वाला फिर से जीत सकता है, लेकिन मन से हारने वाला कभी नहीं जीत सकता।सकारात्मक सोच और पक्का इरादा ही इंसान को असली विजेता बनाते हैं। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं पिछले 40 वर्ष से लेखन और पत्रकारिता से जुड़े हैं) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) ईएमएस / 17 अगस्त 26