लेख
16-Aug-2026
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भारत का 80वाँ स्वतंत्रता दिवस सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप और प्रत्यारोप के कारण चर्चाओं में आ गया है। स्वतंत्रता दिवस पर सभी एक दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं। यह पहली बार देखने को मिल रहा है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और सोनिया गांधी पर निशाना साधा गया है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने रचनात्मक कांग्रेस के सम्मेलन में केंद्र सरकार की विदेश नीति, विदेशी नेताओं को गले लगाने, प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के सदन में नहीं आने, की जो बयानबाजी की, उसके बाद से मामले ने तूल पकड़ लिया। इस विवाद में इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी और प्रधानमंत्री मोदी के संबंधों को लेकर जो कहा गया, उसने विवाद की आग में घी डालने का काम किया। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया पर क्यूबा के पूर्व शासक फिदेल कास्त्रो और इंदिरा गांधी का गले मिलते हुए फोटो जारी कर आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी। जिस पर बवाल शुरू हो गया। भाजपा नेताओं के धड़ाधड़ बयान आने लगे। केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा, यही दिन देखना रह गया था। उन्होंने राहुल गांधी के बयान को देश के दुर्भाग्य से जोड़ दिया। रही सही कसर 15 अगस्त को लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो भाषण दिया। उसमें उन्होंने जेन-जेड और जेन-अल्फा के छात्रों को नक्सलवाद की दिमागी मानसिकता से जोड़ दिया...। पूर्व वित्तमंत्री पी चिदम्बर ने कहा हाँ हम दिमागी नक्सली है। इसके बाद बयान बाजी शुरू हो गई, जो थमने का नाम ही नहीं ले रही है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहला स्वतंत्रता दिवस है, जिसमें सत्ता पक्ष, विपक्ष और छात्रों में इतनी तल्खी देखने को मिल रही है। रही-सही कसर 14 अगस्त की रात्रि में सांसद महुआ मोइत्रा को नादिया सर्किट हाउस से बाहर निकलने का आदेश दिया गया, जिसमें कहा गया कमरे के रखरखाव के लिए महुआ तुरंत कमरा खाली करें। सर्किट हाउस के गेट पर भारी भीड़ जमा थी, जो महुआ के खिलाफ नारे लगा रही थी। महुआ मोइत्रा ने इसकी शिकायत लोकसभा अध्यक्ष और सोशल मीडिया के माध्यम से बताया किस तरह से उनकी जान को खतरा है। 15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में जो झंडा रोहण हुआ, उसमें वंदे मातरम का पूरा गायन ना होकर संविधान सभा ने जिस वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया था, उसका ही गायन हुआ। जिसको लेकर भाजपा ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और सोनिया गांधी को निशाने पर ले लिया। जिस तरह की तल्खी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच में मानसून सत्र के दौरान देखने को मिली, वह तल्खी विकृत स्वरूप में स्वतंत्रता दिवस पर देखने को मिली। जिस तरह के राजनीतिक हालात देश में देखने को मिल रहे हैं। जंतर मंतर और झारखंड के छात्र आंदोलन को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष एक दूसरे पर निशाना साध रहे है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा छात्रों के आंदोलन को नक्सली मानसिकता से जोड़कर लाल किले में जो भाषण दिया गया। 2047 के जो सपने प्रधानमंत्री ने दिखाए हैं। 15 अगस्त का स्वतंत्रता दिवस जो हर वर्ष हर्षो-उल्लास से मनाया जाता था। वह हर्ष कहीं देखने को नहीं मिला, उल्टे जिस तरह से सत्ता पक्ष और विपक्ष एक-दूसरे को घेर रहे हैं, सत्ता पक्ष ने राहुल गांधी को निशाने पर ले रखा है। वहीं राहुल गांधी और विपक्ष ने गृहमंत्री अमित शाह के साथ-साथ अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा है। उसके बाद से ऐसा लगता है, आने वाले दिनों में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच में यह तल्खी और बढ़ेगी। विपक्ष अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है, वहीं सत्ता पक्ष सत्ता को बचाए रखने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहा है। रही-सही कसर छात्र आंदोलन पूरी कर रहे हैं। जेन-जेड के बाद जेन-अल्फा के आंदोलनो ने केंद्र एवं राज्य सरकारों की चिंता बढ़ा दी है। बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुभानअल्लाह की तर्ज पर 16 वर्ष से कम उम्र के छात्र-छात्राएं सड़कों पर आकर बवाल काट रहे हैं। उसने जिला प्रशासन, पुलिस प्रशासन और राज्य सरकारों की नींद हराम कर दी है। इन बच्चों को समझापाना आसान नहीं है। मंत्री से लेकर संत्री तक सब जेन-अल्फा के सामने बेबस नजर आ रहे हैं। पेपर लीक मामले से शुरू हुआ छात्रों का यह आंदोलन निरंतर बढ़ता ही चला जा रहा है। जेन-जेड के आंदोलनकारी अब भ्रष्टाचार और न्याय पालिका के खिलाफ भी मुखर हो गए हैं। जिस तरह से वह न्यायपालिका, शासन और प्रशासन के ऊपर हमले कर रहे हैं, उसने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। जेन-अल्फा के छात्र सड़क, स्कूल की बिल्डिंग, मास्टरों की कमी, बढ़ते बस किराए और अन्य मांगों को लेकर जिस तरह से सड़कों पर आकर कई राज्यों में प्रदर्शन कर रहे हैं, इससे कानून व्यवस्था की स्थिति को लेकर सरकारों की चिंता बढ़ गई है। जिस वर्ग की कभी चिंता नहीं की थी। वहीं छात्र गांव एवं शहरों में धरना देकर अधिकारियों, कलेक्टर और मंत्रियों को बुलाकर अपनी समस्याओं का तुरंत निदान चाहते हैं। इससे निर्वाचित प्रतिनिधियों और सरकारों की चिंता काफी बढ़ गई है। स्वतंत्रता के 80वें वर्ष में प्रवेश करने के साथ ही एक नई जनक्रांति देखने को मिल रही है। वर्तमान स्थिति को देखकर लोगों को 1942 का जेल भरो आंदोलन, 1975 में आपातकाल के पहले का छात्र आंदोलन, 1990 के छात्र आंदोलन तथा अन्ना आंदोलन की यादें ताजा हो रही हैं। बाबा रामदेव ने भी जिस तरह से रंग बदला है, उन्होंने भ्रष्टाचार, शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार को आड़े हाथों लिया है। वह भारत मे हो रहे बदलाव का संकेत है। 2014 के बाद से जो भारत डरा हुआ था, जंतर मंतर आंदोलन के बाद से सभी वर्गों के लोग जैसे डर से बाहर हो गये हैं। ऐसा लगता है, 1947 की स्वतंत्रता के समय जो दृश्य सड़कों पर था, वह 2026 में एक बार पुनः देखने मिल रहा है। 15 अगस्त 1947 को जनता स्वतंत्रता की खुशी मनाने सड़कों पर उतरी थी। आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रूप में वही दृश्य दिख रहा है। किसी में भी डर-भय नहीं दिख रहा है। आंध्र प्रदेश की नालसा यूनिवर्सिटी में जिस तरह का विरोध मुख्य न्यायाधीश के प्रति देखने को मिला है। यह सब आश्चर्यचकित करने वाली घटनाएं हैं। छात्र आंदोलन के बाद लगता है, सभी वर्गों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को समझ लिया है। ईएमएस / 16 अगस्त 26