लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 80वें स्वाधीनता दिवस पर उद्बोधन के दौरान विरोधियों पर कसा गया तंज अब नई और राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है। प्रधानमंत्री की दिमागी नक्सलवाद कह कर की गई टिप्पणी ने नया सियासी तूफान खड़ा कर दिया है। प्रधानमंत्री ने किसे या किन्हें दिमागी नक्सली कहा, क्या विपक्ष और आंदोलनकारी छात्रों को या सरकार पर उंगली उठाने वाले हरेक को या फिर संसद न चलने देने वाले विपक्ष को? निश्चित रूप से इस टिप्पणी पर अभी आगे काफी कुछ सियासत होनी तय है। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि हथियार उठाने वाले नक्सलियों से तो निपट लिया गया, लेकिन अब देश को ‘दिमागी नक्सलियों’ से सतर्क रहने और उन्हें अलग-थलग करने की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि नक्सलवाद और माओवादी हिंसा ने दशकों तक देश के बड़े हिस्से को प्रभावित किया जिसमें हजारों लोगों की जान गई। उनका इशारा था कि अब इस चुनौती के एक दूसरे स्वरूप यानी दिमागी नक्सलवाद से निपटना जरूरी हो गया है। प्रधानमंत्री ने अपनी टिप्पणी में दिमागी नक्सली की कोई स्पष्ट या औपचारिक परिभाषा तो दी नहीं और न ही कोई कानूनी परिभाषा बताई। भले ही उनकी टिप्पणी इशारों में रही, लेकिन राजनीतिक और वैचारिक संदर्भ में इसके मायने बहुत गहरे हैं। जंतर-मंतर पर हाल ही में जिस तरह कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले छात्र आंदोलन हुआ जो देखते-देखते देश का एक बड़ा और अप्रत्याशित आन्दोलन बन खड़ा हुआ। अब उसके फैलते जाने का अंदेशा भी दिखाई दे रहा है। कहीं उसी पर तो यह टिप्पणी नहीं की? या फिर हाल ही में संसद में लगातार गतिरोध बने रहने और नेता विपक्ष राहुल गांधी के तमाम मंचों से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को चुनौती देने की खीझ पर तो निशाना नहीं लगया? सच यह है कि हाल के दिनों में जेन-जी के जंतर-मंतर पर आन्दोलन के बाद 12 वर्षों में पहली बार मोदी सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा और शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लेना पड़ा। उससे भी गंभीर और बड़ी बात यह कि इस मुद्दे को विपक्ष खासकर राहुल गाँधी ने लपक लिया और संसद से सड़क तक प्रभावशाली तरीके से उठाया। निश्चित रूप से जेन-जी आन्दोलन के चलते महज युवा ही नहीं बल्कि उनके अभिभावक भी नाराज दिखे। इससे पहली बार लगा कि मोदी सरकार परेशान है। देखते ही देखते छात्रों की पिटाई, बिना वर्दी के पुलिस वालों की मौजूदगी, पैलेट गन और कील लगी लाठियों के उपयोग को राहुल ने राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया। कहीं दिमागी नक्सली कहकर उनका इशारा इसी पर तो नहीं था? क्या प्रधानमंत्री ने दिमागी नक्सल शब्द का इस्तेमाल करके देश को सुरक्षा, वैचारिक स्थिरता और सामाजिक एकता से जुड़ाव रखने का साफ और कड़ा संदेश तो देने की कोशिश तो नहीं की? अपने उद्बोधन के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि युवाओं को हिंसा और अराजकता से दूर रहना होगा और विकास तथा रचनात्मक कार्यो में सहयोग देना होगा। जाहिर है प्रधानमंत्री दिमागी नक्सलवाद के जरिए विरोधियों को लताड़ तो लगा रहे थे। साथ ही रूठे या उनसे नाराज जेन-जी को भी संदेश दे रहे थे कि वो रचनात्मक कार्यों में सहयोग करें। जंगली नक्सली खत्म हो गए हैं लेकिन जो दिमागी नक्सली सिर उठा रहे हैं, उन्हें पहचानने की बात किसके लिए कह गए? उन्होंने आगे जो कहा वह और भी खास है जिसमें जंगल नक्सलियों की जगह अब शहरों, शिक्षण संस्थानों और बौद्धिक मंचों पर सक्रिय दिमागी नक्सल के लेने की बात कह, सरकार का विरोध करने वालों को तिलमिला दिया। उन्होंने इनसे सावधान रहने का आगाह भी किया। हथियारबंद नक्सल तो गए, लेकिन दिमागी नक्सल मौके की तलाश में हैं जिन्हें पहचानना होगा। उन्होंने साफ किया कि यह वर्ग सीधे हथियार नहीं उठाता, बल्कि अपनी विचारधारा से देश में भ्रम और अराजकता फैलाने की फिराक में रहता है। पहले भी अर्बन नक्सली कहे जाने पर हंगामा हुआ था जिस पर संसद में बताया गया कि संसद में अर्बन नक्सल शब्द की कोई औपचारिक कानूनी परिभाषा नहीं है। सरकार ने संसद में स्पष्ट किया है कि कानून के तहत इस शब्दावली को परिभाषित नहीं किया गया। हाँ, राजनीतिक बयानों और बहसों में इसका उपयोग अक्सर राष्ट्रीय सुरक्षा और वैचारिक विरोध के संदर्भ में किया जाता है। आगे क्या दिमागी नक्सल पर भी यही होगा। काँग्रेस ने दिमागी नक्सलवाद पर प्रधानमंत्री की टिप्पणी को उनकी घबराहट बताया तो प्रधानमंत्री मोदी के दिमागी नक्सल बयान पर कॉकरोच जनता पार्टी की प्रतिक्रिया ने इस मुद्दे को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। अब सवाल यह है कि सरकार और विपक्ष इस बहस को किस दिशा में ले जाते हैं। राजनीतिक बहस तेज हो गई है। जहाँ सीजेपी ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए उल्टा सरकार से सवाल पूछा कि शिक्षित युवाओं को नक्सली कहना कितना उचित है? साथ ही यह भी चेताया कि कि देश के हर जिले में एक नया जंतर-मंतर जन्म ले रहा है। यह वह जगह होगी, जहां निराश लोगों को उम्मीद और कमजोर लोगों को एकजुट होने की ताकत मिलेगी। सीजेपी ने सत्ता पक्ष पर युवाओं और जेन-जी को बांटने की कोशिश करने का आरोप भी लगाया। सीजेपी की यह टिप्पणी कि इतिहास बताता है कि एकजुट जनता से अधिक शक्तिशाली कुछ नहीं होता, वो बांटेंगे, हम जोड़ेंगे। वो डर फैलाएंगे, हम साहस फैलाएंगे। अब मन डर से मुक्त है और वापसी का रास्ता नहीं है। जाहिर है कि दिमागी नक्सली को लेकर अभी काफी कुछ बयान, विरोध, हंगामा और बहुत कुछ देखने मिलना तय है। अब यह वक्त ही तय करेगा दिमागी नक्सली वाली टिप्पणी किस पर कितना भारी पड़ती है? (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) ईएमएस / 16 अगस्त 26