लेख
16-Aug-2026
...


गुजरात में प्राकृतिक खेती को गांव-गांव तक पहुंचाने की दिशा में राज्य सरकार का चार जिलों में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित करने का निर्णय महज एक कृषि योजना नहीं, बल्कि खेती की बदलती जरूरतों के अनुरूप एक महत्वपूर्ण प्रयोग है। नवसारी, मोरबी, भावनगर और छोटा उदेपुर में बनने वाले इन केंद्रों में एक साथ करीब 100 किसानों को प्रशिक्षण देने की व्यवस्था होगी। वर्ष 2026-27 में इसके लिए 20 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। खास बात यह है कि इन केंद्रों को केवल प्रशिक्षण भवन नहीं बनाया जा रहा, बल्कि प्राकृतिक खेती के मॉडल केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना है, जहां किसान खेत देखकर, मिट्टी की जांच कराकर और जैविक इनपुट तैयार करना सीखकर वापस अपने खेतों में प्रयोग कर सकेंगे। यहां एक सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या गुजरात प्राकृतिक खेती के ऐसे केंद्र स्थापित करने वाला देश का पहला राज्य है? उपलब्ध सरकारी और सार्वजनिक रिकॉर्ड को देखें तो इसका उत्तर सीधे तौर पर हां नहीं कहा जा सकता। प्राकृतिक खेती को बड़े स्तर पर बढ़ावा देने का सबसे चर्चित उदाहरण आंध्र प्रदेश है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार आंध्र प्रदेश ने 2018 में बड़े पैमाने पर रासायनिक-मुक्त खेती की ओर बढ़ने की योजना शुरू की थी और उसे देश का पहला शत-प्रतिशत प्राकृतिक खेती वाला राज्य बनाने का लक्ष्य रखा गया था। वहीं नीति आयोग के अनुसार आंध्र प्रदेश का सामुदायिक प्रबंधित प्राकृतिक खेती कार्यक्रम किसानों के स्तर पर दुनिया के सबसे बड़े कृषि-पारिस्थितिकी कार्यक्रमों में शामिल रहा है। इसलिए गुजरात को प्राकृतिक खेती का पहला राज्य कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा, लेकिन चार जिलों में जिस तरह प्रशिक्षण, उत्पादन, परीक्षण, प्रसंस्करण और बाजार से जुड़ी सुविधाओं को एक ही व्यवस्था में जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, वह गुजरात को एक अलग मॉडल जरूर बना सकता है। गुजरात पहले से ही प्राकृतिक खेती के क्षेत्र में सक्रिय राज्यों में शामिल है। नीति आयोग के अनुसार राज्य में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए पहले से कई योजनाएं चल रही हैं और अलग-अलग कृषि क्षेत्रों में इसका विस्तार किया गया है। गुजरात की नई पहल का सबसे मजबूत पक्ष यही है कि किसान को केवल भाषण या पुस्तिका के माध्यम से प्राकृतिक खेती नहीं सिखाई जाएगी। प्रस्तावित केंद्रों में जीवामृत, बीजामृत और प्राकृतिक कीटनाशकों जैसे जैव-इनपुट तैयार करने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा। बीज, पौध, कटिंग और कलम जैसी रोपण सामग्री उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी होगी। मिट्टी परीक्षण और कृषि उत्पादों की गुणवत्ता जांच के लिए मार्गदर्शन मिलेगा। कटाई के बाद फसल के प्रबंधन, प्राथमिक प्रसंस्करण, मूल्यवर्धन और नई तकनीक के इस्तेमाल में भी किसानों की मदद की जाएगी। यानी किसान के सामने केवल यह सवाल नहीं रहेगा कि प्राकृतिक खेती कैसे करें, बल्कि यह भी कि अच्छी फसल के बाद उसे सुरक्षित कैसे रखें, उसकी गुणवत्ता कैसे जांचें और बाजार में बेहतर मूल्य कैसे प्राप्त करें। आज खेती की सबसे बड़ी चुनौती केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं है। किसान को लागत, मिट्टी की सेहत, पानी की उपलब्धता, बाजार और उपभोक्ता की बदलती मांग को एक साथ देखना पड़ता है। प्राकृतिक खेती इस पूरी श्रृंखला को अधिक टिकाऊ बनाने का रास्ता खोल सकती है। प्राकृतिक खेती का सबसे बड़ा लाभ मिट्टी की सेहत से जुड़ा है। लगातार रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल से मिट्टी की जैविक संरचना प्रभावित हो सकती है। नीति आयोग के प्राकृतिक खेती संबंधी पोर्टल के अनुसार प्राकृतिक खेती मिट्टी के सूक्ष्मजीवों और जैविक गतिविधियों को बेहतर बनाने, जैव विविधता बढ़ाने और पानी के अधिक विवेकपूर्ण इस्तेमाल में मदद कर सकती है। जब मिट्टी में जैविक गतिविधि मजबूत होती है तो वह केवल पौधे को सहारा देने वाली जमीन नहीं रहती, बल्कि एक जीवंत कृषि तंत्र बन जाती है। पानी की बचत भी प्राकृतिक खेती का महत्वपूर्ण पक्ष है। खेत की मिट्टी को ढककर रखने, अलग-अलग फसलों को साथ लेने और मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने जैसी पद्धतियां पानी के वाष्पीकरण को कम करने और नमी बनाए रखने में मदद कर सकती हैं। ऐसे समय में जब देश के कई कृषि क्षेत्र जल संकट का सामना कर रहे हैं, खेती में हर बूंद का बेहतर इस्तेमाल किसान की आय और कृषि की स्थिरता दोनों के लिए जरूरी है। लागत में कमी प्राकृतिक खेती को किसानों के लिए आकर्षक बनाती है। यदि किसान अपने खेत और पशुधन से उपलब्ध संसाधनों से कुछ जैव-इनपुट तैयार कर लेता है तो बाजार से खरीदे जाने वाले बाहरी इनपुट पर निर्भरता घट सकती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अध्ययन कार्यक्रमों से जुड़ी सरकारी जानकारी के अनुसार उचित तकनीक और संतुलित तरीके से प्राकृतिक खेती अपनाने पर उत्पादन में सुधार के उदाहरण मिले हैं। मिट्टी की सेहत बेहतर होने से फसल की गुणवत्ता और दीर्घकालिक उत्पादन पर भी सकारात्मक प्रभाव देखा गया है, जबकि रासायनिक लागत कम होने से शुद्ध लाभ बढ़ सकता है। हालांकि यह मान लेना भी उचित नहीं होगा कि प्राकृतिक खेती अपनाते ही हर फसल और हर जमीन पर उत्पादन अपने आप बढ़ जाएगा। कृषि मिट्टी, वर्षा, सिंचाई, फसल, जलवायु और किसान की तकनीकी समझ पर निर्भर करती है। इसलिए गुजरात के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की असली सफलता इस बात से तय होगी कि वहां किसानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार वैज्ञानिक और व्यावहारिक प्रशिक्षण कितना मिलता है। केवल जीवामृत या बीजामृत बनाना सिखाना पर्याप्त नहीं होगा; मिट्टी परीक्षण, फसल चयन, कीट प्रबंधन, सिंचाई, उत्पादकता और बाजार की पूरी जानकारी भी जरूरी होगी। गुजरात की मिट्टी को प्राकृतिक खेती के लिए देश में सर्वोपरि कहना भी उचित नहीं होगा। गुजरात में मिट्टी और जलवायु की विविधता है और राज्य विभिन्न फसलों के उत्पादन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। नीति आयोग के अनुसार गुजरात में सात कृषि-जलवायु क्षेत्र हैं और यहां अलग-अलग प्रकार की मिट्टियां तथा विविध फसल प्रणालियां पाई जाती हैं। लेकिन प्राकृतिक खेती में किसी एक राज्य की मिट्टी को सार्वभौमिक रूप से सर्वश्रेष्ठ नहीं कहा जा सकता। आंध्र प्रदेश इसका अच्छा उदाहरण है। वहां प्राकृतिक खेती को समुदाय आधारित मॉडल के साथ जोड़ा गया है। किसानों को स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण देने के लिए अनुभवी किसानों को ही संसाधन व्यक्ति बनाया जाता है। इससे ज्ञान गांव के भीतर ही फैलता है। दूसरी ओर सिक्किम ने जैविक खेती के क्षेत्र में देश-दुनिया में अलग पहचान बनाई है और उसका जैविक मिशन लंबे समय से चर्चा में रहा है। इसका अर्थ साफ है कि प्राकृतिक या जैविक खेती की सफलता केवल मिट्टी पर निर्भर नहीं करती। किसान प्रशिक्षण, स्थानीय संसाधन, बाजार, प्रमाणन, प्रसंस्करण, उपभोक्ता मांग और सरकारी सहयोग भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। गुजरात की पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह प्राकृतिक खेती को केवल खेत तक सीमित रखने के बजाय पूरी कृषि मूल्य श्रृंखला से जोड़ने का प्रयास कर रही है। उदाहरण के लिए यदि भावनगर का किसान प्राकृतिक तरीके से अच्छी फसल पैदा करता है, लेकिन उसके पास गुणवत्ता जांच, पैकिंग और बाजार तक पहुंच नहीं है तो उसकी मेहनत का पूरा आर्थिक लाभ उसे नहीं मिलेगा। सेंटर ऑफ एक्सीलेंस यदि उत्पादन से लेकर मूल्यवर्धन और बाजार तक यह कड़ी मजबूत कर सके तो प्राकृतिक खेती वास्तव में किसान की आय बढ़ाने का माध्यम बन सकती है। देश के लिए भी गुजरात का यह प्रयोग महत्वपूर्ण है। केंद्र सरकार पहले से प्राकृतिक खेती को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर शोध और प्रशिक्षण को बढ़ावा दे रही है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने 16 राज्यों में 20 सहयोगी केंद्रों के माध्यम से प्राकृतिक खेती के विभिन्न फसल प्रणालियों का अध्ययन शुरू किया है। जुलाई 2026 में भारतीय कृषि प्रणालियां अनुसंधान संस्थान, मोदीपुरम को ब्रिक्स नेटवर्क में प्राकृतिक खेती के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की भूमिका भी दी गई है, जिससे शोध, ज्ञान-विनिमय और प्रशिक्षण को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। अब आवश्यकता इस बात की है कि गुजरात के चार केंद्र केवल भवन बनकर न रह जाएं। प्रत्येक केंद्र को अपने क्षेत्र की प्रमुख फसलों के अनुसार मॉडल खेत विकसित करने चाहिए। किसान वहां जाकर यह देख सके कि कम लागत में फसल कैसे तैयार होती है, मिट्टी में क्या बदलाव आया, पानी की कितनी बचत हुई और बाजार में उत्पाद को किस तरह बेहतर मूल्य मिला। अगर इन परिणामों का वैज्ञानिक तरीके से रिकॉर्ड तैयार किया गया तो आने वाले वर्षों में यही आंकड़े दूसरे राज्यों के किसानों के लिए सबसे बड़ा प्रशिक्षण बन सकते हैं। प्राकृतिक खेती को लेकर देश को किसी एक राज्य को विजेता घोषित करने के बजाय अलग-अलग राज्यों के सफल प्रयोगों से सीखना चाहिए। आंध्र प्रदेश का सामुदायिक मॉडल, सिक्किम का जैविक अनुभव और गुजरात का प्रशिक्षण तथा मूल्यवर्धन आधारित मॉडल एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं। केंद्र सरकार इन मॉडलों का तुलनात्मक अध्ययन कर ऐसी राष्ट्रीय नीति बना सकती है जिसमें हर राज्य अपनी मिट्टी, पानी, जलवायु और प्रमुख फसलों के अनुसार प्राकृतिक खेती का मॉडल विकसित करे। आखिरकार प्राकृतिक खेती का लक्ष्य केवल रसायन कम करना नहीं, बल्कि किसान की लागत घटाना, मिट्टी को स्वस्थ रखना, पानी बचाना, फसल की गुणवत्ता सुधारना और किसान को बाजार में बेहतर स्थिति देना होना चाहिए। गुजरात के चार सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इसी व्यापक सोच के साथ काम करते हैं तो वे केवल गुजरात के किसानों के प्रशिक्षण केंद्र नहीं रहेंगे, बल्कि देश की कृषि नीति के लिए प्रयोगशाला बन सकते हैं। आने वाले समय में असली सफलता इस बात से मापी जाएगी कि इन केंद्रों से प्रशिक्षण लेकर खेत में लौटने वाला किसान कितनी कम लागत में कितनी बेहतर, सुरक्षित और बाजार योग्य पैदावार हासिल करता है। यदि यह प्रयोग सफल हुआ तो गुजरात का मॉडल देश के दूसरे राज्यों के लिए एक मजबूत विकल्प और केंद्र सरकार के लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्राकृतिक खेती का विस्तार करने का उपयोगी रास्ता बन सकता है। (वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार-स्तम्भकार) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 16 अगस्त /2026