राष्ट्रीय
17-Jun-2026
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अमेरिकी उपभोक्ता संस्कृति पर मोहन भागवत का प्रहार नई दिल्ली,(ईएमएस)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अमेरिकी उपभोक्तावादी जीवनशैली की आलोचना करते हुए कहा कि यदि पूरी दुनिया उसी मॉडल का अनुसरण करने लगे तो पृथ्वी के संसाधन मानवता की जरूरतें पूरी नहीं कर पाएंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि भारत को आर्थिक विकास की राह पर आगे बढ़ते हुए अपनी सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों को नहीं छोड़ना चाहिए। दिल्ली में आयोजित 18वें बीएमएल मुंजाल अवार्ड्स समारोह को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि आर्थिक समृद्धि का उद्देश्य केवल भौतिक सुविधाओं का विस्तार नहीं होना चाहिए, बल्कि उसमें संयम, नैतिकता और समाज के व्यापक कल्याण की भावना भी शामिल होनी चाहिए। यहां मोहन भागवत ने कहा कि अमेरिका का जीवन स्तर दुनिया में अक्सर आदर्श माना जाता है, लेकिन उसके पीछे संसाधनों की अत्यधिक खपत भी जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा, यदि भारत के 142 करोड़ लोग अमेरिकी जीवनशैली अपनाने लगें, तो एक पृथ्वी पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि छह पृथ्वी की आवश्यकता पड़ेगी। उनका कहना था कि पृथ्वी के संसाधनों पर केवल एक देश या समाज का अधिकार नहीं है। संसाधनों के उपयोग में संतुलन और जिम्मेदारी का भाव होना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियों और अन्य देशों के हित भी सुरक्षित रह सकें। आरएसएस प्रमुख ने वैश्विक राजनीति पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अधिकांश देशों की मित्रता और सहयोग रणनीतिक तथा आर्थिक हितों से संचालित होते हैं। बिना किसी देश का नाम लिए उन्होंने संकेत दिया कि बड़ी शक्तियां अक्सर अपने हितों की रक्षा को प्राथमिकता देती हैं और उसी आधार पर साझेदारी विकसित करती हैं। भागवत ने कहा कि भारत की परंपरा केवल अपने हितों तक सीमित नहीं रही है। उन्होंने पड़ोसी देशों की सहायता के उदाहरण देते हुए कहा कि संकट के समय भारत ने हमेशा सहयोग का हाथ बढ़ाया है। उन्होंने मालदीव को पेयजल उपलब्ध कराने और आर्थिक संकट से जूझ रहे श्रीलंका की सहायता का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत ने कठिन परिस्थितियों में पड़ोसियों के साथ खड़े होकर अपनी जिम्मेदारी निभाई है। उनके अनुसार, हो सकता है कि हम इतने समृद्ध न हों कि सभी की सहायता कर सकें, लेकिन जब पड़ोसी संकट में होते हैं तो भारत उनके साथ खड़ा रहता है। चरित्र के बिना शक्ति विनाशकारी मोहन भागवत ने भारत को आर्थिक और सामरिक रूप से मजबूत बनने की आवश्यकता पर बल दिया, लेकिन साथ ही चेतावनी भी दी कि केवल शक्ति प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि दुनिया ताकतवर देशों की बात सुनती है, इसलिए भारत को हर प्रकार की शक्ति अर्जित करनी चाहिए। हालांकि, शक्ति के साथ सद्भावना, नैतिकता और चरित्र का होना भी उतना ही आवश्यक है। उनके अनुसार, चरित्रहीन शक्ति अंततः विनाश का कारण बन सकती है। भागवत ने कहा, भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक विशिष्ट पद्धति और दर्शन है। उन्होंने कहा कि यदि भारत केवल अमेरिका या चीन जैसी महाशक्ति बनने की दौड़ में अपने मूल्यों और सांस्कृतिक पहचान को खो देता है, तो उसका वास्तविक सार समाप्त हो जाएगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत का विकास ऐसा होना चाहिए जो आर्थिक प्रगति के साथ-साथ सामाजिक उत्तरदायित्व, नैतिकता और मानव कल्याण को भी समान महत्व दे। यही भारतीय सभ्यता की विशेषता रही है और भविष्य में भी यही मार्गदर्शक सिद्धांत होना चाहिए। हिदायत/ईएमएस 17जून26