नई दिल्ली (ईएमएस)। भारत में कानूनी तौर पर पहली बार फांसी की सजा महाराजा नंदकुमार को दी गई थी। उन्हें वर्ष 1775 में कलकत्ता सुप्रीम कोर्ट ने जाली दस्तावेज बनाने के आरोप में दोषी ठहराया था। उस समय के ब्रिटिश कानून के तहत जालसाजी के लिए मौत की सजा का प्रावधान था। महाराजा नंदकुमार, जिन्हें नुनकोमार के नाम से भी जाना जाता था, बंगाल के नवाब के लिए विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर रहे थे। यह एक बेहद विवादास्पद मामला था क्योंकि उन्होंने तत्कालीन गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स पर रिश्वतखोरी के गंभीर आरोप लगाए थे। इतिहास में इस फांसी को एक न्यायिक हत्या भी माना जाता है, क्योंकि ऐसा दावा किया जाता है कि वॉरेन हेस्टिंग्स ने अपने प्रभाव का उपयोग कर उन्हें जानबूझकर फंसाया था। 8 जून को उन पर मुकदमा शुरू हुआ, 15 जून तक लगातार सुनवाई चली और 16 जून को उन्हें दोषी ठहराया गया। आखिरकार, 5 अगस्त 1775 को उन्हें फांसी दे दी गई, जो भारत के न्यायिक इतिहास का एक काला अध्याय बन गया। आजादी के बाद, भारत में मौत की सजा के बढ़ते मामलों के मद्देनजर, देश के सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर महत्वपूर्ण दिशानिर्देश दिए। वर्ष 1982 में, बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य के ऐतिहासिक मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि मौत की सजा केवल दुर्लभतम मामलों में ही दी जानी चाहिए, जहाँ अपराध की क्रूरता और प्रकृति असाधारण हो। इस सिद्धांत ने मृत्युदंड के दायरे को काफी सीमित कर दिया। एक रिपोर्ट के अनुसार, 2001 से 2023 तक, देश की विभिन्न अदालतों ने 3026 लोगों को मौत की सजा सुनाई, लेकिन इनमें से केवल आठ को ही वास्तविक फांसी दी गई। इसमें हाल ही में निर्भया मामले के चार दोषियों को दी गई फांसी भी शामिल है, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। सूली की क्रूर प्रथा का इतिहास ईसा मसीह के जन्म से भी पहले का है और इसे फारसी साम्राज्य में शुरू हुआ माना जाता है। चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में, महान सिकंदर ने फारसियों से यह प्रथा अपनाई, जिसे बाद में मिस्र, कार्थेज और रोमन साम्राज्य जैसे शक्तिशाली सभ्यताओं में भी बड़े पैमाने पर लागू किया गया। यह एक अत्यंत दर्दनाक दंड था, जिसमें अपराधी को खून बहने, अत्यधिक प्यास और दम घुटने जैसी असहनीय पीड़ा से कई दिनों तक तड़प-तड़प कर मौत होती थी। आज दुनिया के किसी भी कानूनी तंत्र में सूली की सजा को मान्यता नहीं है। जबकि फांसी अभी भी कुछ देशों में कानूनी मौत की सजा का हिस्सा है, भारत में इसे दुर्लभतम मामलों तक सीमित रखने का मानवीय सिद्धांत अपनाया गया है, जो न्याय के साथ-साथ गरिमा का भी सम्मान करता है। मालूम हो कि ब्रिटिश शासन से पहले भारत में सिर काटना, हाथी से कुचलवाना, दीवार में चुनवाना या सूली पर चढ़ाना जैसे बर्बर दंड प्रचलित थे। हालांकि, 1860 में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) लागू होने के बाद ये सभी पुराने तरीके प्रतिबंधित कर दिए गए और फांसी को ही एकमात्र कानूनी मौत की सजा का तरीका माना गया। सुदामा/ईएमएस 17 जून 2026