राष्ट्रीय
17-Jun-2026
...


नई दिल्ली,(ईएमएस)। दुनिया में अंतिम संस्कार कई तरीके से किए जाते हैं कहीं शव को जलाया तो कहीं दफनाया और कहीं समुद्र में बहाया जाता है, लेकिन भारत के करीब एक ऐसा इलाका भी है, जहां मौत के बाद शव को पहाड़ की चोटी पर ले जाकर गिद्धों के सामने छोड़ दिया जाता है। इतना ही नहीं, उससे पहले शव को काटा भी जाता है ताकि पक्षी उसे आसानी से खा सकें। पहली नजर में यह परंपरा बेहद अजीब और डरावनी लगती है, लेकिन वहां के लोगों के लिए यह एक पवित्र धार्मिक रस्म है। उनका मानना है कि इससे मृत व्यक्ति की आत्मा को मुक्ति मिलती है और वह अगले जन्म की यात्रा पर निकल जाती है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक यह परंपरा तिब्बत में निभाई जाती है। इसे स्काई बुरियल या आकाशीय अंतिम संस्कार कहा जाता है। तिब्बती बौद्ध धर्म में यह सदियों पुरानी परंपरा है और आज भी कई इलाकों में इसका पालन किया जाता है। तिब्बत के लोगों का मानना है कि मृत्यु के बाद शरीर सिर्फ एक खाली खोल रह जाता है। आत्मा शरीर छोड़ देती है, इसलिए शरीर को प्रकृति को लौटा देना सबसे बड़ा दान है। किसी व्यक्ति की मृत्यु होने के बाद उसके शव को सफेद कपड़े में लपेटकर घर के एक कोने में रखा जाता है। आमतौर पर तीन से पांच दिन तक शव वहीं रहता है। इस दौरान बौद्ध भिक्षु और लामा धार्मिक मंत्रों का जाप करते हैं। माना जाता है कि इससे मृतक की आत्मा को शांति मिलती है और उसे स्वर्ग की ओर जाने का रास्ता मिलता है। शुभ दिन तय होने के बाद शव को पहाड़ों में बने विशेष स्काई बुरियल स्थल पर ले जाया जाता है। ये जगह आमतौर पर आबादी से काफी दूर होती हैं। अंतिम संस्कार से पहले शव को भ्रूण जैसी मुद्रा में मोड़ा जाता है यानी शरीर को इस तरह रखा जाता है जैसे कोई बच्चा मां के गर्भ में होता है। सुबह-सुबह शव को पहाड़ की चोटी पर पहुंचाया जाता है, जहां विशेष रूप से प्रशिक्षित लोग इस रस्म को पूरा करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक स्काई बुरियल के विशेष कर्मकांड करने वाले लोग शव को छोटे-छोटे हिस्सों में काटते हैं ताकि गिद्ध उसे आसानी से खा सकें। इसके बाद आसपास मौजूद गिद्धों को बुलाया जाता है। कुछ ही देर में दर्जनों गिद्ध वहां पहुंच जाते हैं और शव को खा जाते हैं। जब शरीर का मांस खत्म हो जाता है, तब बची हुई हड्डियों को पीसकर जौ के आटे के साथ मिलाया जाता है और गिद्धों को खिला दिया जाता है। तिब्बती बौद्ध धर्म में गिद्धों को पवित्र पक्षी माना जाता है। लोगों का विश्वास है कि यदि गिद्ध शव को पूरी तरह खा लें तो इसका मतलब है कि मृत व्यक्ति ने अच्छा जीवन जिया और उसकी आत्मा को शांति मिल गई। वहां के लोग गिद्धों को धरती और स्वर्ग के बीच संदेशवाहक की तरह देखते हैं, जो आत्मा को अगले संसार तक पहुंचाने में मदद करते हैं। ऐसे अंतिम संस्कार के रस्म के पीछे धार्मिक मान्यताओं के अलावा भौगोलिक हालात भी एक बड़ी वजह बताई जाती है। तिब्बत का बड़ा हिस्सा ऊंचे पहाड़ों और चट्टानी जमीन से घिरा हुआ है। ऐसी जगहों पर कब्र खोदना मुश्किल होता है। वहीं लकड़ी की कमी के कारण शवों का दाह संस्कार करना भी आसान नहीं होता। इसलिए सदियों पहले यह परंपरा विकसित हुई और बाद में धार्मिक विश्वासों का हिस्सा बन गई। स्काई बुरियल को बेहद पवित्र माना जाता है। यही वजह है कि बाहरी लोगों और पर्यटकों को इस समारोह में शामिल होने की अनुमति नहीं होती। यहां तक कि मृतक के परिवार के सदस्य भी अंतिम प्रक्रिया में मौजूद नहीं रहते। माना जाता है कि किसी बाहरी व्यक्ति की मौजूदगी आत्मा की यात्रा में बाधा डाल सकती है। सिराज/ईएमएस 17 जून 2026