टीएमसी के 20 सांसदों की बगावत का मामला नई दिल्ली,(ईएमएस)। पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 20 सांसदों द्वारा पार्टी से अलग होने और नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय की घोषणा के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को समर्थन देने और सदन में विपक्षी खेमे से अलग बैठने की अनुमति मांगी है। इस घटनाक्रम के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या इन सांसदों पर दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता की कार्रवाई हो सकती है या फिर वे कानूनी रूप से सुरक्षित रहेंगे। संवैधानिक विशेषज्ञों और कानूनी जानकारों के बीच इस मुद्दे को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही है। एक पक्ष का मानना है कि बागी सांसदों के खिलाफ संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत कार्रवाई हो सकती है, जबकि दूसरा पक्ष इसे वैध राजनीतिक कदम बता रहा है। अयोग्यता की आशंका जताने वाले विशेषज्ञों का तर्क है कि दसवीं अनुसूची में किसी भी विलय को वैध मानने के लिए मूल राजनीतिक दल का किसी अन्य दल में विलय होना आवश्यक है। उनका कहना है कि केवल संसदीय दल या विधायी दल के सदस्यों का समूह बनाकर किसी दूसरी पार्टी में शामिल हो जाना कानून की भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता। इस दृष्टिकोण के अनुसार, यदि मूल राजनीतिक संगठन का विलय नहीं हुआ है और केवल सांसदों ने अलग रास्ता चुना है, तो यह दल-बदल कानून के दायरे में आ सकता है। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था पार्टी आधारित प्रणाली पर काम करती है। सांसद या विधायक किसी राजनीतिक दल के चुनाव चिह्न पर जनता से जनादेश प्राप्त करते हैं। ऐसे में यदि निर्वाचित प्रतिनिधि उस दल को छोड़े बिना किसी अन्य राजनीतिक मंच का हिस्सा बनने का दावा करते हैं, तो उनकी स्थिति कानूनी जांच के दायरे में आ सकती है। पूर्व संसदीय अधिकारियों का भी मानना है कि दसवीं अनुसूची राजनीतिक दलों को केंद्रीय महत्व देती है। उनके अनुसार, कानून का उद्देश्य उन जनप्रतिनिधियों को सुरक्षा देना था, जिनकी पूरी पार्टी किसी अन्य दल में विलय का फैसला करती है। केवल विधायी दल का अलग होकर नई राजनीतिक पहचान बनाना इस प्रावधान के तहत स्वतः संरक्षित नहीं माना जा सकता। दूसरी ओर, बागी खेमा अपने कदम को वैध ठहराने के लिए पूर्व के कुछ न्यायिक निर्णयों का हवाला दे रहा है। हालांकि संवैधानिक मामलों के जानकारों का कहना है कि हाल के वर्षों में उच्चतम न्यायालय ने अपने कई फैसलों में यह स्पष्ट किया है कि विधायी दल और मूल राजनीतिक दल को पूरी तरह अलग इकाइयों के रूप में नहीं देखा जा सकता। न्यायालय ने यह भी माना है कि व्हिप जारी करने और विधायकों या सांसदों को दिशा-निर्देश देने का अधिकार मूल राजनीतिक दल के पास होता है। अब इस पूरे विवाद की निगाहें लोकसभा अध्यक्ष के निर्णय और संभावित न्यायिक समीक्षा पर टिकी हैं। यदि मामला अदालत तक पहुंचता है, तो यह फैसला न केवल इन 20 सांसदों के राजनीतिक भविष्य को प्रभावित करेगा, बल्कि दल-बदल कानून की व्याख्या और राजनीतिक दलों के अधिकारों को लेकर भी एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित कर सकता है। वीरेंद्र/ईएमएस 17 जून 2026