नई दिल्ली,(ईएमएस)। अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए समझौते के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव कम होने की उम्मीद जगी है। इसके साथ ही कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई है और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर कुछ राहत के संकेत मिले हैं। इससे भारत सहित दुनिया के तमाम देशों को तेल संकट से राहत मिलने की उम्मीद जगी है। हालांकि इसमें कुछ व्यावधान भी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि स्थिति जितनी सरल दिखाई दे रही है, वास्तविकता उससे कहीं अधिक जटिल है और वैश्विक तेल आपूर्ति को सामान्य होने में अभी समय लगेगा। समझौते के बाद रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही धीरे-धीरे शुरू हो गई है। यह वही समुद्री मार्ग है, जहां से दुनिया के एक बड़े हिस्से का तेल और गैस व्यापार गुजरता है। युद्ध और तनाव के कारण यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहा, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ा। अब रास्ता खुलने के बावजूद सप्लाई तुरंत सामान्य होने की संभावना नहीं है और विशेषज्ञों का अनुमान है कि इसमें कई सप्ताह से लेकर कई महीने तक लग सकते हैं। समुद्री ट्रैकिंग एजेंसियों के अनुसार, सोमवार तक भी होर्मुज क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही सीमित रही। कई जहाज अब भी बंदरगाहों या सुरक्षित क्षेत्रों में रुके हुए हैं और उन्हें आगे बढ़ने की स्पष्ट अनुमति नहीं मिली है। हालांकि लंबे समय बाद जीपीएस सिग्नल बहाल होने से नौवहन में कुछ सुधार हुआ है, जिससे जहाजों को दिशा निर्धारण में मदद मिल रही है। युद्ध से पहले इस जलमार्ग से प्रतिदिन 100 से अधिक जहाज गुजरते थे, लेकिन हाल के तनावपूर्ण हालात में यह संख्या घटकर लगभग 10 जहाज प्रतिदिन तक पहुंच गई थी। विशेषज्ञों के अनुसार, अचानक आई इस गिरावट के कारण आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह प्रभावित हुई और कई देशों को अपने रणनीतिक तेल भंडार का उपयोग करना पड़ा। लंबे समय तक समुद्र में खड़े रहने के कारण कई जहाजों की तकनीकी स्थिति भी प्रभावित हुई है। गर्म समुद्री जल में खड़े रहने से जहाजों के निचले हिस्सों पर समुद्री जीव और शैवाल जम गए हैं, जिससे उनकी गति कम हो गई है। ऐसे जहाजों की सफाई और मरम्मत में अतिरिक्त समय लग सकता है, जिससे आपूर्ति बहाल करने की प्रक्रिया और धीमी हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल समुद्री मार्ग खुलना पर्याप्त नहीं है। पहले इस क्षेत्र को पूरी तरह सुरक्षित घोषित करना होगा, इसके बाद ही तेल टैंकरों की नियमित आवाजाही संभव हो पाएगी। साथ ही बंद पड़े तेल और गैस क्षेत्रों में उत्पादन फिर से शुरू करना होगा, जिसमें भी समय लगेगा। कमोडिटी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि होर्मुज जलडमरूमध्य जून के अंत तक पूरी तरह सक्रिय भी हो जाता है, तब भी तेल की आपूर्ति को एशियाई बाजारों तक पहुंचने और रिफाइनिंग प्रक्रिया पूरी होने में लगभग 50 दिनों से अधिक का समय लग सकता है। ऐसे में वास्तविक राहत अगस्त के अंत या सितंबर से पहले मिलने की संभावना कम मानी जा रही है। ऊर्जा विशेषज्ञों का अनुमान है कि खाड़ी देशों में उत्पादन को पूर्व स्तर पर पहुंचने में 4 से 6 महीने तक का समय लग सकता है, जबकि कुछ तेल क्षेत्रों में तकनीकी समस्याओं के कारण यह अवधि 9 महीने तक भी खिंच सकती है। विशेष रूप से इराक और कुवैत के कुछ क्षेत्रों में उत्पादन बहाली को लेकर अधिक चुनौतियां सामने आ रही हैं। इस प्रकार, भले ही शांति और समझौते की खबरों ने वैश्विक बाजारों को कुछ राहत दी हो, लेकिन ऊर्जा आपूर्ति की पूरी बहाली अभी लंबी और जटिल प्रक्रिया बनी हुई है। वीरेंद्र/ईएमएस 17 जून 2026